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सिंधु जल संधि विवाद: पाकिस्तान कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ले गया मामला

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भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को लेकर एक नया विवाद फिर गरमा गया है, जिसमें पाकिस्तान ने सीओए (कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन) को सक्रिय करके भारत के खिलाफ कानूनी प्रक्रिया शुरू कर दी है, जबकि भारत ने उस अदालत की वैधता से साफ इनकार कर दिया है और अपना रुख कड़ा कर रखा है। यह मामला 1960 में हुई जल संधि के ढांचे और दोनों देशों के बीच जारी तनाव को फिर से सुर्खियों में ला दिया है।

इस विवाद का नवीनतम दौर 29 जनवरी, 2026 को कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन द्वारा जारी ‘प्रोसीजरी ऑर्डर नंबर 19’ के कारण शुरू हुआ, जिसमें भारत से कहा गया कि वह अपने जलविद्युत परियोजनाओं के “ऑपरेशनल पोंडेज लॉगबुक” जैसे रिकार्ड पेश करे। यह निर्देश इस बात का संकेत है कि अदालत मामले की “सेकंड फेज ऑफ मेरिट्स” पर सुनवाई करना चाहती है। कोर्ट ने यह भी कहा कि 2–3 फरवरी को हेग स्थित पीस पैलेस में सुनवाई निर्धारित है और भारत ने न तो कोई प्रतिवाद पेश किया है और न ही इसमें भाग लेने का कोई संकेत दिया है।

भारत का موقف रहा है कि यह कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन संविधान के ढांचे के बाहर है और इसकी वैधता संधि के मूल नियमों के अनुसार नहीं है। भारत ने पहले भी इस तरह की अदालत की वैधता को “अवैध और रद्द” बताया है क्योंकि संधि के तहत ऐसी किसी प्रक्रिया की स्पष्ट व्यवस्था नहीं है और एक पक्ष की अनुमति के बिना इसे स्थापित करना संधि का उल्लंघन है।

यह विवाद उस फैसले से जुड़ा है जब भारत ने 23 अप्रैल, 2025 को सिंधु जल संधि को ‘स्थगित’ कर दिया था—जिन दिनों जम्मू-कश्मीर में पहलगाम में हुए एक आतंकवादी हमले के बाद भारत ने संधि को अस्थायी रूप से लागू न करने का निर्णय लिया था, यह कहते हुए कि पाकिस्तान की “असामान्य शत्रुता” संधि के मूल उद्देश्यों के साथ मेल नहीं खाती। इस कदम को दोनों देशों के राजनैतिक और सामरिक संबंधों में तनाव के रूप में देखा गया।

पाकिस्तान ने इस कार्रवाई के खिलाफ कई अंतरराष्ट्रीय और कूटनीतिक कदम उठाए हैं, जिसमें यह साबित करने की कोशिश शामिल है कि भारत संधि के तहत अपनी प्रतिबद्धताओं का उल्लंघन कर रहा है। पाकिस्तान का दावा है कि भारत ने सिंधु जल संधि के तहत उपलब्ध कराए जा रहे जल प्रवाह को रोकने या बदलने का प्रयास किया है, जिससे उसके कृषि और जल सुरक्षा पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।

भारत का कहना है कि संधि का स्थगन पाकिस्तान द्वारा सीमा पार आतंकवाद जारी रखने के कारण किया गया था, और जब तक वह इस मुद्दे को हल नहीं करता, संधि को लागू नहीं किया जाएगा। इस रुख के तहत भारत ने कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन की प्रक्रिया में शामिल होने से इनकार किया है और अपनी निरपेक्ष संधि नीति को बनाए रखा है।

विशेषज्ञों के अनुसार यह विवाद एक तकनीकी जल-संधि मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि अब यह दो देशों के बीच राजनैतिक तनाव, सुरक्षा चिंताओं और अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे में आने वाला एक प्रमुख मुद्दा बन चुका है। जैसे-जैसे कानूनी प्रक्रियाएँ आगे बढ़ेंगी, दोनों देशों के बीच राजनीतिक, कूटनीतिक और सामरिक बातचीत पर भी इसका असर पड़ेगा और यह दक्षिण एशिया के भूजल संसाधनों की साझा नीति को चुनौती देता दिख रहा है।

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