बिहार के कटिहार जिले में 31 साल बाद एक परिवार को अपना बिछड़ा बेटा वापस मिल गया। मनिहारी प्रखंड के कांटाकोष गांव के रहने वाले पिंटू यादव बचपन में परिवार से बिछड़ गए थे। इतने वर्षों बाद जब वह अपने पैतृक गांव लौटे, तो उनकी पहचान अब्दुल जब्बार के रूप में थी। बेटे को सामने देखकर मां मीणा देवी भावुक हो गईं, वहीं पिता मोतीलाल यादव और परिवार के अन्य सदस्यों ने भी उसे गले लगाकर स्वागत किया। इस लंबे इंतजार के बाद हुए मिलन की खबर पूरे इलाके में फैल गई।
परिजनों के अनुसार, पिंटू करीब आठ साल के थे, जब वह अपने दोस्तों के साथ ट्रेन में चढ़ गए थे। सफर के दौरान उन्हें नींद आ गई। उनके दोस्त ट्रेन से उतर गए, लेकिन पिंटू उसमें ही रह गए। जब उनकी नींद खुली, तब तक ट्रेन उन्हें पश्चिम बंगाल के राधिकापुर इलाके तक ले जा चुकी थी। अनजान जगह पर अकेले पड़ जाने के कारण वह अपने घर का रास्ता नहीं खोज पाए और परिवार से बिछड़ गए।
पश्चिम बंगाल में भटकते हुए पिंटू को अब्दुल रहीम नाम के व्यक्ति ने सहारा दिया। उन्होंने बच्चे को अपने घर में जगह दी और उसका पालन-पोषण किया। समय बीतने के साथ पिंटू की पहचान अब्दुल जब्बार के रूप में हो गई। वह वहीं बड़े हुए और आगे चलकर उनकी शादी मुतैना खातून से हुई। आज उनके दो बेटे और एक बेटी हैं। इस तरह उन्होंने पश्चिम बंगाल में अपना परिवार और जीवन बसा लिया, जबकि कटिहार में उनके जन्मदाता माता-पिता बेटे के लौटने की उम्मीद लगाए रहे।
रिपोर्टों के मुताबिक, अपने बचपन और गांव की धुंधली यादें पिंटू के मन में अब भी मौजूद थीं। दिल्ली में मजदूरी के दौरान उनकी मुलाकात मनिहारी के कुछ लोगों से हुई। बातचीत में उन्होंने अपने पिता का नाम मोतीलाल यादव और अपने गांव के गंगा किनारे होने की जानकारी साझा की। इसके बाद दोस्तों की मदद से उन्होंने अपने परिवार का पता लगाने की कोशिश शुरू की। लंबे समय से अधूरी रही तलाश को आगे बढ़ाने में स्थानीय लोगों की मदद अहम साबित हुई।
जब अब्दुल जब्बार कांटाकोष गांव पहुंचे, तो शुरुआत में परिवार के लिए इतने वर्षों बाद उन्हें पहचानना आसान नहीं था। लेकिन उनकी आंख के ऊपर पुराने कट का निशान देखकर मां को बचपन की याद आ गई। परिजनों के मुताबिक, शरीर पर मौजूद पुराने जख्मों के निशान और बचपन से जुड़ी कुछ खास बातों ने भी पहचान की पुष्टि करने में मदद की। इसके बाद मां, पिता और भाई उनसे लिपट गए। घर में खुशी और भावुकता का माहौल बन गया।
इस कहानी का एक अहम पहलू यह भी है कि पिंटू यादव उर्फ अब्दुल जब्बार की जिंदगी में अब दो परिवार हैं। एक ओर कटिहार में उनके जन्मदाता माता-पिता और भाई-बहन हैं, तो दूसरी ओर पश्चिम बंगाल में वह परिवार है जिसने बचपन में उन्हें सहारा दिया, उनका पालन-पोषण किया और जिसके साथ उन्होंने अपना वैवाहिक जीवन शुरू किया। ऐसे में वर्षों बाद अपने जन्मदाता परिवार से मिलना उनके लिए भावनात्मक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है, लेकिन उनके दूसरे परिवार से भी गहरा जुड़ाव बना हुआ है।
परिवार और ग्रामीणों के बीच इस पुनर्मिलन को लेकर खुशी का माहौल है। खबरों के अनुसार, पिंटू अपने दोनों परिवारों से जुड़े रहना चाहते हैं। उनके पिता ने भी उनकी पत्नी और बच्चों को स्वीकार करने की इच्छा जताई है। हालांकि, आगे वह कहां रहेंगे और दोनों परिवारों के बीच समय कैसे बिताएंगे, यह फैसला उनकी अपनी इच्छा और पारिवारिक सहमति से तय होगा।
कटिहार की यह घटना तीन दशक से अधिक समय तक बिछड़े रिश्तों के दोबारा जुड़ने की कहानी है। बचपन में ट्रेन में छूट जाने से शुरू हुआ यह सफर उन्हें एक नई जगह, नई पहचान और नए परिवार तक ले गया। अब 31 साल बाद अपने जन्मदाता माता-पिता से मुलाकात ने पुरानी यादों को फिर जीवित कर दिया है। इस मिलन के साथ परिवार के सामने अब सबसे अहम बात यही है कि पिंटू अपने जीवन के अगले फैसले दोनों परिवारों के प्रति अपने लगाव और अपनी इच्छा के अनुसार ले सकें।
