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पीओके में बड़े विरोध-आन्दोलन: शहबाज शरीफ सरकार और सेना की दमन नीतियों के खिलाफ जनता सड़कों पर

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पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में हाल के दिनों में बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन भड़क उठे हैं, जिनमें आम जनता और स्थानीय संगठन शहबाज शरीफ सरकार और उसके साथ खड़ी सेना की नीति व दमनशैली के खिलाफ मुखर हो उठे हैं। विरोध की पैठ और तीव्रता को देखते हुए इसे पिछले वर्षों का सबसे व्यापक अशांति दौर बताया जा रहा है।

ये आंदोलन दरअसल एक 38-मेनू (demand charter) से शुरू हुआ था, जिसमें स्थानीय लोगों ने सरकार से कई मांगों को पूरा करने की अपील की थी। लेकिन जब सरकार ने उनकी मांगों पर जवाब नहीं दिया, तो लोग अब सत्ता और सैनिक दमन दोनों के खिलाफ एक सामूहिक विद्रोह की राह पर हैं।

विरोध के दौरान बुधवार को सुरक्षाबलों की गोलीबारी में कम से कम 12 नागरिकों की मौत हुई — इनमें कई प्रदर्शनकारी शामिल हैं।  यह हिंसक प्रतिक्रिया उस समय सामने आई, जब भीड़ ने कई क्षेत्रों में प्रदर्शन किए — मुजफ्फराबाद, रावलकोट, नीलम घाटी, कोटली आदि स्थानों पर।  बताया जाता है कि मुजफ्फराबाद में पाँच, धीरकोट में पांच और दादयाल में दो लोगों की गोली लगने से मौत हुई। साथ ही कुछ पुलिसकर्मियों की जान जाने की भी खबरें हैं।

आंदोलनकारी किसी भी विशिष्ट संस्था के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि वे अपनी मूल राजनीतिक, आर्थिक व सामाजिक असमर्थाओं और अन्यायों को उजागर कर रहे हैं। उनका कहना है कि PoK में दशकों से लोगों को मूलभूत अधिकार नहीं दिए गए — बिजली, राशन, टैक्स में राहत, स्थानीय स्वशासन, और विशेष आरक्षित सीटों की व्यवस्था जैसे मुद्दे प्राथमिक हैं।

सरकार ने विरोध को दबाने के लिए बड़े पैमाने पर सुरक्षा बलों को तैनात किया है, इंटरनेट और मोबाइल सेवाओं को अवरुद्ध किया है और कई संवेदनशील स्थानों की घेराबंदी की है। इस कदम से जनता की आवाज बाहर न जा सके — यही रणनीति देखी जा रही है।

विरोध के नेताओं और सामाजिक संगठनों का कहना है कि जब तक उनकी सभी 38 मांगों को पूरा नहीं किया जाता, वे शांतिपूर्ण आंदोलन जारी रखेंगे। वे विशेष रूप से मांग कर रहे हैं कि PoK विधानसभा में पाकिस्तान में रहते शरणार्थियों के लिए आरक्षित 12 सीटों को समाप्त किया जाए, बिजली दरों और आटे पर सब्सिडी दिया जाए, और सरकारी अधिकारियों के विशेषाधिकारों में कटौती हो।

हालांकि सरकार ने यह दावा किया है कि वह अधिकांश मांगों को स्वीकार कर चुकी है, लेकिन प्रतियोगी आरोप हैं कि ये सिर्फ कागज़ी दावे हैं — और जनता तब तक सन्तुष्ट नहीं होगी जब तक कि संवाद और क्रियान्वयन हो।

यह आंदोलन सिर्फ क्षेत्रीय समानता की मांग नहीं है, बल्कि यह व्यापक राजनीतिक टकराव का संकेत भी है — जिसमें केंद्र सरकार, स्थानीय प्रशासन और सुरक्षा बलों के बीच शक्ति संघर्ष उभरकर सामने आ रहा है। यदि यह संघर्ष रक्तपात और सशस्त्र कार्रवाई की ओर बढ़े, तो उसका असर न केवल PoK में बल्कि पाकिस्तान की आंतरिक राजनीतिक स्थिरता पर भी पड़ेगा।

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