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जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा मामले में केजरीवाल, सिसोदिया और संजय सिंह को अवमानना नोटिस, दिल्ली हाईकोर्ट में बढ़ा सियासी तापमान

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दिल्ली हाईकोर्ट में आम आदमी पार्टी के प्रमुख Arvind Kejriwal, वरिष्ठ नेता Manish Sisodia और सांसद Sanjay Singh की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं। अदालत ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की अदालत की कार्यवाही के वीडियो सोशल मीडिया पर साझा किए जाने के मामले में इन नेताओं समेत कई अन्य लोगों को अवमानना नोटिस जारी किया है। यह मामला दिल्ली शराब नीति केस की सुनवाई से जुड़ा हुआ है, जिसमें अदालत की कार्यवाही के कथित वीडियो क्लिप्स इंटरनेट पर वायरल हो गए थे।

दरअसल, अप्रैल 2026 में दिल्ली हाईकोर्ट में एक महत्वपूर्ण सुनवाई हुई थी, जिसमें Arvind Kejriwal ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा से खुद को मामले की सुनवाई से अलग करने की मांग की थी। इसके बाद अदालत की कार्यवाही से जुड़े वीडियो क्लिप सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर तेजी से फैलने लगे। याचिकाकर्ता अधिवक्ता वैभव सिंह ने अदालत में दावा किया कि इन वीडियो को बिना अनुमति रिकॉर्ड और साझा किया गया, जो हाईकोर्ट के नियमों का उल्लंघन है और न्यायपालिका की गरिमा को प्रभावित करता है।

दिल्ली हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने इस मामले को गंभीर मानते हुए Meta, Google और X जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को ऐसे वीडियो हटाने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि कोर्ट की कार्यवाही की अनधिकृत रिकॉर्डिंग और प्रसारण न्यायिक व्यवस्था के लिए चिंताजनक है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि इस तरह की घटनाओं पर नियंत्रण नहीं किया गया तो भविष्य में न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर असर पड़ सकता है।

इस पूरे विवाद की शुरुआत तब हुई जब जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने Arvind Kejriwal की वह याचिका खारिज कर दी, जिसमें उन्होंने अदालत से खुद को केस से अलग करने की मांग की थी। जस्टिस शर्मा ने अपने आदेश में कहा था कि किसी भी न्यायाधीश पर केवल आशंका या राजनीतिक दबाव के आधार पर सवाल नहीं उठाए जा सकते। उन्होंने यह भी कहा कि न्यायपालिका की निष्पक्षता पर अविश्वास जताना उचित नहीं है।

मामले में कांग्रेस नेता Digvijaya Singh और पत्रकार Ravish Kumar समेत कई अन्य लोगों के नाम भी सामने आए हैं। अदालत ने सभी पक्षों से जवाब मांगा है और अगली सुनवाई की तारीख तय कर दी गई है। इस बीच सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स ने अदालत को बताया कि जिन लिंक की शिकायत की गई थी, उनमें से कई पहले ही हटाए जा चुके हैं।

राजनीतिक गलियारों में इस मामले को लेकर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। आम आदमी पार्टी इसे राजनीतिक प्रतिशोध बता रही है, जबकि विपक्षी दलों का कहना है कि न्यायपालिका की गरिमा बनाए रखना सभी राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला आने वाले समय में सोशल मीडिया पर कोर्ट कार्यवाही साझा करने के नियमों को लेकर बड़ा उदाहरण बन सकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार डिजिटल दौर में अदालतों की कार्यवाही के वीडियो वायरल होना एक नई चुनौती बन गया है। कई बार संपादित क्लिप्स के जरिए अदालत की छवि प्रभावित करने की कोशिश की जाती है। ऐसे में हाईकोर्ट का यह रुख भविष्य के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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