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बांग्लादेश में उस्मान हादी की हत्या के बाद देशभर में हिंसा और राजनीतिक उबाल

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बांग्लादेश की राजनीति और सामाजिक माहौल वर्तमान में एक बड़े संकट का सामना कर रहा है जब देश के प्रमुख छात्र नेता शरीफ उस्मान हादी की हत्या से व्यापक हिंसा और अशांति फैल गई है। हादी, जो ढाका से आगामी सत्राह जनवरी 2026 के चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार और इंक़िलाब मंच (Inquilab Mancha) के मुखर प्रवक्ता थे, को 12 दिसंबर को ढाका में बाइक सवार नकाबपोश हमलावरों ने गोली मारी थी और गंभीर हालत में उन्हें इलाज के लिए सिंगापुर ले जाया गया। वहाँ छह दिनों की इलाज के बाद गुरुवार रात उन्होंने अपनी गंभीर चोटों के चलते दम तोड़ दिया, जिससे देशभर में आक्रोश भड़क उठा।

उनकी मौत की खबर के साथ ही विरोध प्रदर्शन तेज़ हो गए और ढाका व अन्य प्रमुख शहरों की सड़कों पर हजारों लोग उबल पड़े। प्रदर्शनकारियों ने प्रमुख मीडिया हाउसों द देली स्टार और प्रथम आलो के दफ्तरों पर तोड़फोड़ और आगजनी की, जिससे वहां फंसे दर्जनों पत्रकारों को बचाने के लिए सुरक्षा बलों को हस्तक्षेप करना पड़ा।

हादी का राजनीतिक जीवन लंबे संघर्ष और विवादों से भरा रहा है। उन्हें शेख हसीना सरकार के कट्टर आलोचक के तौर पर जाना जाता था, और उन्होंने ग्रेटर बांग्लादेश जैसे विवादित नक्शों पर बयानबाजी भी की थी, जिसमें भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को शामिल दिखाया गया था, जिससे भारत-बांग्लादेश संबंधों में तनाव और बढ़ा।

हत्या के बाद प्रदर्शनकारियों ने न सिर्फ भारत के खिलाफ नारेबाजी की बल्कि पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना और उनकी पार्टी आवामी लीग के कार्यकर्ताओं को भी निशाना बनाया। कुछ भीड़ ने भारतीय उच्चायोग पर पत्थरबाज़ी की और आरोप लगाया कि हादी के हत्यारों को भारत शरण दे रहा है, हालांकि भारत ने इन आरोपों का खंडन किया है।

घटना को लेकर राजनीतिक विभाजन और बढ़ गया है। कुछ समूह इसका लिंक इस्लामी कट्टरवाद और देश के आंतरिक राजनीतिक खेलों से जोड़ रहे हैं, तो वहीं विपक्ष का कहना है कि यह हत्या चुनावों को प्रभावित करने और लोकतांत्रिक आवाज़ों को दबाने की कोशिश का हिस्सा है। सुरक्षा बलों को देशभर में तैनात किया गया है और गुरुवार को राष्ट्रीय शोक घोषित किया गया है।

देश में जारी विरोध प्रदर्शन, मीडिया पर हमले, धार्मिक तथा राजनीतिक समूहों के बीच संघर्ष, और भारत-बांग्लादेश संबंधों पर पड़े प्रभाव ने स्थिति को बेहद संवेदनशील बना दिया है। राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि आगामी चुनाव के मद्देनज़र यह घटनाक्रम बांग्लादेश की आंतरिक स्थिरता के साथ-साथ क्षेत्रीय राजनीति पर भी गहरे प्रभाव डाल सकता है।

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