बिहार के बहुचर्चित भरत भूषण तिवारी हत्याकांड को लेकर एक बार फिर सियासी और सामाजिक बहस तेज हो गई है। इस मामले में नामजद आरोपी रहे तत्कालीन एसडीपीओ राजेश शर्मा को नई तैनाती मिलने के बाद मृतक के परिवार ने प्रशासनिक फैसले पर गंभीर सवाल उठाए हैं। परिवार का आरोप है कि जिस अधिकारी के खिलाफ हत्या समेत अन्य गंभीर धाराओं में प्राथमिकी दर्ज है, उसे दंडात्मक कार्रवाई के बजाय नई जिम्मेदारी सौंपना न्याय व्यवस्था के प्रति लोगों के विश्वास को कमजोर करता है।
जानकारी के अनुसार, भोजपुर जिले में हुए भरत भूषण तिवारी एनकाउंटर मामले में प्राथमिकी दर्ज होने के बाद तत्कालीन एसडीपीओ राजेश शर्मा को पुलिस मुख्यालय से संबद्ध कर दिया गया था। अब उन्हें मद्यनिषेध एवं राज्य स्वापक नियंत्रण ब्यूरो में डीएसपी के रूप में नई जिम्मेदारी दी गई है। राज्य में हाल ही में पुलिस अधिकारियों के बड़े स्तर पर हुए तबादलों के बीच यह नियुक्ति सबसे अधिक चर्चा का विषय बनी हुई है।
भरत भूषण तिवारी के परिजनों ने इस फैसले पर नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा कि जब किसी अधिकारी के खिलाफ हत्या जैसे गंभीर आरोपों की जांच चल रही हो, तब उसे महत्वपूर्ण पद पर नियुक्त करना पीड़ित परिवार के लिए निराशाजनक संदेश देता है। परिवार का कहना है कि उन्हें लगातार ऐसा महसूस हो रहा है कि न्याय मिलने की उम्मीद कम होती जा रही है। उनका आरोप है कि यदि निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करनी है तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ विभागीय और कानूनी कार्रवाई को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
भरत भूषण तिवारी की मौत जून 2026 में भोजपुर जिले के शाहपुर क्षेत्र में पुलिस मुठभेड़ के दौरान हुई थी। पुलिस ने उस समय इसे एनकाउंटर बताया था, जबकि परिजनों का दावा है कि भरत भूषण ने आत्मसमर्पण कर दिया था और उसके बाद उनकी हत्या कर दी गई। इस मामले ने राज्यभर में व्यापक चर्चा को जन्म दिया और विपक्षी दलों, सामाजिक संगठनों तथा मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने निष्पक्ष जांच की मांग उठाई। बाद में संबंधित पुलिस अधिकारियों के खिलाफ प्राथमिकी भी दर्ज की गई थी।
मृतक के पिता काशीनाथ तिवारी ने कहा कि उनका परिवार न्यायिक प्रक्रिया पर भरोसा रखता है, लेकिन हालिया प्रशासनिक निर्णय से यह संदेश गया है कि सरकार इस मामले को अपेक्षित गंभीरता से नहीं ले रही है। उन्होंने चेतावनी दी कि जब तक मामले की निष्पक्ष जांच पूरी नहीं होती और दोषियों के खिलाफ ठोस कार्रवाई नहीं की जाती, तब तक उनका संघर्ष जारी रहेगा। परिवार ने यह भी स्पष्ट किया है कि वह न्याय के लिए सभी संवैधानिक और कानूनी विकल्पों का सहारा लेगा।
हालांकि इस नई तैनाती को प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा माना जा रहा है, लेकिन अब तक संबंधित विभाग की ओर से सार्वजनिक रूप से कोई विस्तृत स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है कि यह निर्णय किन परिस्थितियों में लिया गया। ऐसे में राजनीतिक गलियारों से लेकर आम जनता के बीच इस फैसले को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि संवेदनशील मामलों में जांच पूरी होने तक संबंधित अधिकारियों की नियुक्तियों को लेकर अतिरिक्त सतर्कता बरतना आवश्यक होता है, ताकि जांच की निष्पक्षता पर कोई सवाल खड़ा न हो।
