बिहार विधानसभा के बजट सत्र के दौरान रविवार और सोमवार को प्रमुख राजनीतिक उथल-पुथल का माहौल देखने को मिला जब दिवंगत नेता रामविलास पासवान को लेकर सदन में गंभीर विवाद उत्पन्न हो गया। लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के समर्थकों और विपक्षी दलों के बीच तूल पकड़ते इस विवाद का केंद्र बना वह बयान जिसमें एक राजद विधायक ने पासवान को ‘बेचारा’ कह दिया, जिससे सदन का माहौल पूरी तरह तल्ख हो गया और भारी हंगामे के बीच कार्यवाही को स्थगित करना पड़ा।
यह विवाद तब उभरा जब राजद विधायक कुमार सर्वजीत, जो खुद एक दलित विधायक हैं, विधानसभा में बोलते हुए दिवंगत केंद्रीय मंत्री और एलजेपी संस्थापक रामविलास पासवान का जिक्र करते हुए ‘बेचारा’ शब्द का इस्तेमाल कर दिया। इसके बाद सत्ताधारी लोजपा (रामविलास) के विधायकों ने इसे अपने नेता के अपमान और अवमानना के रूप में लिया और तेजस्वी यादव तथा राजद से माफी मांगने की ज़ोरदार मांग उठाई। विरोध के स्वर उठते ही सदन में भारी नारेबाजी और आरोप-प्रत्यारोप का दौर चला, जिसके कारण स्पीकर को कार्यवाही को लगभग 20-30 मिनट पहले ही स्थगित करना पड़ा।
सर्वजीत ने बाद में साफ़ किया कि उनका यह बयान अवैधानिक, घृणास्पद या अपमानजनक शब्द नहीं है, बल्कि उन्होंने यह कहा कि वे पहले भी रामविलास पासवान की प्रतिमा लगाने की मांग कर रहे हैं और उनका कथन सम्मानात्मक था। उन्होंने आरोप लगाया कि पासवान के राजनीतिक योगदान और जातीय विभाजन के मुद्दों को लेकर सदन में बहस चल रही थी, न कि किसी अपमान के लिए शब्द चुने गए थे।
इसके बाद इस मुद्दे पर बहस और तीखी हो गई जब राजद के रणविजय साहू ने दिवंगत रामविलास पासवान के लिए भारत रत्न पुरस्कार की मांग विधानसभा में उठाई। साहू ने कहा कि पासवान को भारत के सबसे बड़े नागरिक सम्मान से सम्मानित किया जाना चाहिए, यह एक ऐसी मांग है जो उनके महान योगदान को दर्शाती है। इस मांग ने भी राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं को और भड़काया।
लोजपा के नेता राजू तिवारी समेत कई विधायकों ने इशारा किया कि ‘बेचारा’ शब्द का उपयोग उनके “आइडियोलॉजिकल फादर” के प्रति अपमानजनक भावना दर्शाता है और तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाली पार्टी से इसे स्पष्ट करना आवश्यक है। इसी मुद्दे पर रविवार को एलजेपी (RV) के विधायकों ने विधानसभा परिसर के बाहर विरोध प्रदर्शन भी किया और तेजस्वी यादव की पुतला दहन तक किया था।
बिहार की राजनीति में रामविलास पासवान की छवि एक बड़े दलित नेता और केंद्रीय मंत्री के रूप में रही है और उनके प्रति भावनाएँ आज भी गहरी हैं। विवाद ने राज्य के राजनीतिक विमर्श को फिर से गर्मा दिया है और दलित राजनीति तथा सम्मान के मुद्दों पर भी गहन बहस को जन्म दिया है। कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विधानसभा के बजट सत्र के साथ यह विवाद बिहार की सियासी पटल पर सामुदायिक भावनाओं और गठबंधन राजनीति को प्रभावित कर सकता है।
राजद विधायक के बयान पर जारी विवाद में अब विधानसभा के भीतर और बाहर दोनों जगह व्यापक राजनीतिक प्रतिक्रिया और आरोप-प्रत्यारोप देखने को मिल रहे हैं, जिससे यह स्पष्ट हो गया है कि राजनैतिक नेताओं के भाषणों और शब्दों पर नज़र रखने की संवेदनशीलता आज भी प्रबल है। आगे चलकर इस मामले पर राजनीतिक मोर्चे क्या रणनीति अपनाते हैं, यह आगामी दिनों की चर्चा का विषय रहेगा।
