देश में इतिहास और राजनीति को एक साथ जोड़ने वाली एक नई बहस 30 जनवरी 2026 को उस समय फैल गई जब पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के एक इंटरव्यू के बयान ने तीखी प्रतिक्रिया पैदा कर दी। अंसारी ने महमूद गज़नी और लोदी वंश के शासकों को “भारतीय लुटेरा” कहकर रोज़मर्रा के इतिहास-ग्रंथों में कठिनाई से बयां किए जाने वाले मध्यकालीन घटनाक्रम पर एक अलग दृष्टिकोण पेश किया। उनका कहना था कि जिन्हें शासकों को आज हम “विदेशी आक्रमणकारी” मानते हैं — चाहे वह गज़नी हो या लोदी — वे वास्तव में भारत के भीतर के व्यक्ति थे, और उन्हें “विदेशी” कहने का राजनीतिक लाभ उठाया जाता रहा है।
इस बयान के बाद भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने निर्मोही प्रतिक्रिया व्यक्त की और न केवल अंसारी के विचारों को खारिज किया, बल्कि कांग्रेस पार्टी और उसके “इकोसिस्टम” को भी कटघरे में खड़ा कर दिया। पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता शहज़ाद पूनावाला ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म “एक्स” (पूर्व ट्विटर) पर एक वीडियो पोस्ट करते हुए कहा कि अंसारी और कांग्रेस-समर्थक विचारधारा समूह मध्यकालीन शासकों, जिनके आक्रमणों से हिन्दू मंदिरों को भारी क्षति पहुँची थी, की महिमा-मंडन कर रहे हैं। पूनावाला ने विशेष रूप से सोमनाथ मंदिर के विध्वंस का ज़िक्र करते हुए कहा कि कांग्रेस और उसके समर्थक ऐसे शासकों को सही ठहराने की कोशिश कर रहे हैं जिन्होंने भारतीय इतिहास में क्रूरता दिखलाई।
पूनावाला ने कहा कि यह कोई अलग-थलग बयान नहीं है, बल्कि एक पैटर्न है जिसमें कांग्रेस और उसका इकोसिस्टम हमेशा ऐसे तत्वों का समर्थन करता है जो इतिहास में हिन्दुओं और भारत की विरासत के ख़िलाफ़ क्रियाएँ कर चुके हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि शरजील इमाम और उमर खालिद जैसे विवादित व्यक्तियों को “युवा” कहने के बाद अब महमूद गज़नी जैसे आक्रमणकारीयों को “हिंदुस्तानी” बताया जा रहा है, जिससे यह दिखता है कि कांग्रेस और उसके समर्थक इतिहास की वास्तविकता को मुड़-मरोड़ कर पेश कर रहे हैं।
बीजेपी के अन्य नेताओं ने भी कांग्रेस पर निशाना साधा। एक अन्य प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने पार्टी को “Modern India Muslim League” कहाकर आरोप लगाया कि कांग्रेस और उसके समर्थक विदेशी आक्रमणकारियों की क्रूरता को सफ़ेद धौलने (whitewashing) की कोशिश करते हैं और हिन्दू समुदाय के प्रति नफरत रखते हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यह विवाद न केवल इतिहास-व्याख्या का है, बल्कि राजनीतिक लाभ और राष्ट्रवादी भावनाओं को उभारने का भी एक हिस्सा बन चुका है। भाजपा ने यह सवाल कांग्रेस और उसके नेतृत्व, खासकर राहुल गांधी, के रुख पर भी उठाया कि क्या वे हामिद अंसारी के इस बयान से सहमत हैं या नहीं। इस बहस ने इतिहास, राष्ट्रीयता और राजनीति के बीच की जटिल कड़ियों को फिर से उजागर कर दिया है।
विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया फिलहाल बयानबाज़ी तक सीमित है, लेकिन यह मामला आने वाले दिनों में देशव्यापी बहस और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का मुद्दा बन सकता है। राजनीतिक विशेषज्ञों का अनुमान है कि ऐसे बयान और प्रतिक्रियाएँ आगामी चुनावी परिदृश्य में शीर्ष मुद्दों और विचारधारात्मक विभाजनों को और उभार सकती हैं।
