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शहबाज़ शरीफ का बड़ा कबूलनामा

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पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ ने एक बेहद स्पष्ट और अभूतपूर्व बयान देते हुए देश की गंभीर आर्थिक स्थिति को लेकर अपने और सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की वैश्विक यात्राओं पर खुलकर रोशनी डाली है। शरीफ ने कहा है कि “जब मैं और आसिम मुनीर दुनिया भर में कर्ज़ के लिए भीख मांगने जाते हैं तो हमें शर्म आती है।” उन्होंने इस प्रक्रिया को न केवल आर्थिक मजबूरी बल्कि राष्ट्रीय आत्म-सम्मान पर भारी बोझ बताया।

शहबाज़ शरीफ ने यह बयान शुक्रवार को इस्लामाबाद में शीर्ष व्यापारियों और निर्यातकों से बात करते हुए दिया, जहाँ उन्होंने पाकिस्तान की मौजूदा आर्थिक चुनौतियों और अपनाई गयी नीतियों पर विस्तृत चर्चा की। उन्होंने स्वीकार किया कि पाकिस्तान को अपनी अर्थव्यवस्था को स्थिर करने के लिए कई बार IMF (International Monetary Fund) और मित्र देशों से वित्तीय सहायता लेने के लिए जाना पड़ा है, जिसमें चीन, सऊदी अरब, UAE और क़तर जैसे सहयोगी शामिल रहे हैं।

शरीफ ने यह भी बताया कि विदेशी मुद्रा भंडार में पिछले समय में वृद्धि दर्ज की गई है, लेकिन इस वृद्धि में अधिकांशतः उन कर्ज़ों का योगदान है जो पाकिस्तान को विश्व समुदाय से मिले हैं। उन्होंने कहा कि “कर्ज़ लेना हमारे आत्म-सम्मान पर भारी बोझ है और सिर झुकाने जैसा अनुभव देता है।” वहीं, यह भी स्वीकार किया कि इन सहायता मांगने की यात्राओं में अक्सर पाकिस्तान को उन शर्तों को स्वीकार करना पड़ा है जो उसकी दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों के अनुकूल नहीं होते।

शहबाज़ शरीफ ने स्पष्ट किया कि यह निर्भरता और भीख मांगने जैसा कदम सिर्फ सरकार की रणनीति का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह देश की वित्तीय स्थिति की कठिन हकीकत का प्रतिबिंब है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की सरकार और सेना दोनों ने मिलकर इस दिशा में प्रयास किए हैं, लेकिन विदेशी सहायता की अधिकता ने देश को कमजोर स्थिति में ला दिया है।

विश्लेषकों का मानना है कि इस बयान से यह साफ होता है कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था गंभीर दबाव में है और उसके पास वैकल्पिक आर्थिक समाधान ढूंढने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं। बढ़ते ऋण और विदेशी सहायता पर निर्भरता ने देश की संप्रभुता और निर्णय लेने की क्षमता को चुनौती दी है। बहुत से आलोचक इस स्थिति को पाकिस्तान की आर्थिक नीतियों और राजनीतिक अस्थिरता का परिणाम मानते हैं।

पाकिस्तान की जनता के बीच भी इस बयान को लेकर विभाजित प्रतिक्रियाएँ देखने को मिल रही हैं—कुछ लोग इसे वास्तविकता को स्वीकार करने वाला साहसी कदम मान रहे हैं, तो वहीं अन्य इसे देश की असफल नीतियों और नेतृत्व की आलोचना के रूप में देख रहे हैं। इस बयान का अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर भी असर पड़ने की संभावना जताई जा रही है, खासकर उन देशों पर जो पाकिस्तान को आर्थिक सहायता मुहैया करा रहे हैं या देने पर विचार कर रहे हैं।

कुल मिलाकर शहबाज़ शरीफ का यह बयान पाकिस्तान की आर्थिक कमजोरियों, विदेशी कर्ज़ पर निर्भरता, और आत्म-सम्मान से जुड़े जटिल सवालों को सीधे तौर पर सामने लाता है, जो आने वाले समय में देश की नीतियों और उसके वैश्विक रिश्तों को प्रभावित कर सकता है।

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