देश में प्रस्तावित परिसीमन (Delimitation) को लेकर राजनीतिक माहौल गरम हो गया है। लोकसभा सीटों के पुनर्वितरण और महिला आरक्षण को लागू करने की तैयारी के बीच उत्तर और दक्षिण भारत के बीच प्रतिनिधित्व को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। केंद्र सरकार 2029 के आम चुनाव से पहले लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर लगभग 850 करने की योजना बना रही है, ताकि 33% महिला आरक्षण को लागू किया जा सके।
इस प्रस्ताव के तहत करीब 307 नई सीटें जोड़ी जाएंगी और उनका बंटवारा जनसंख्या के आधार पर किया जाएगा, जिससे “एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य” का सिद्धांत लागू हो सके।
यहीं से विवाद की शुरुआत होती है। दक्षिण भारत के राज्य—जैसे तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश—इसका विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, लेकिन अब उसी कारण उन्हें कम सीटें मिलने का खतरा है, जिससे उनका राजनीतिक प्रभाव घट सकता है।
वहीं उत्तर भारत के राज्यों—जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान—की जनसंख्या ज्यादा तेजी से बढ़ी है, इसलिए उन्हें ज्यादा सीटें मिलने की संभावना है। अनुमान है कि उत्तर प्रदेश की सीटें 80 से बढ़कर 120 या उससे अधिक हो सकती हैं, जबकि दक्षिणी राज्यों की हिस्सेदारी प्रतिशत के हिसाब से घट सकती है।
इस पूरे मुद्दे का सीधा संबंध महिला आरक्षण कानून से भी है। 33% महिलाओं को संसद और विधानसभा में आरक्षण देने का प्रावधान पहले ही पारित हो चुका है, लेकिन इसे लागू करने के लिए परिसीमन जरूरी है, इसलिए दोनों मुद्दे आपस में जुड़े हुए हैं।
राजनीतिक स्तर पर भी इस पर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। दक्षिण के कई नेताओं ने इसे संघीय ढांचे के लिए खतरा बताया है और कहा है कि केवल जनसंख्या के आधार पर सीटों का बंटवारा करना न्यायसंगत नहीं होगा। वहीं केंद्र सरकार का तर्क है कि परिसीमन का उद्देश्य हर नागरिक को समान प्रतिनिधित्व देना है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद सिर्फ सीटों का नहीं, बल्कि देश के संघीय संतुलन, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और भविष्य की राजनीति का भी बड़ा मुद्दा बन चुका है। आने वाले समय में संसद के विशेष सत्र में इस पर गहन चर्चा होने की संभावना है, जिससे यह तय होगा कि देश में राजनीतिक प्रतिनिधित्व का नया स्वरूप कैसा होगा।
