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जिबूती में इस्माइल उमर गुएल्लेह की फिर जीत, छठी बार राष्ट्रपति बनकर बढ़ाया 27 साल का शासन

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अफ्रीकी देश जिबूती में हुए राष्ट्रपति चुनाव में लंबे समय से सत्ता में बने हुए Ismail Omar Guelleh ने एक बार फिर बड़ी जीत दर्ज की है। उन्होंने लगभग 97.8% वोट हासिल कर लगातार छठी बार राष्ट्रपति पद पर कब्जा जमाया है। इस जीत के साथ उनका शासनकाल करीब 27 साल तक पहुंच गया है, जिससे वे अफ्रीका के सबसे लंबे समय तक सत्ता में रहने वाले नेताओं में शामिल हो गए हैं।

जिबूती, जिसकी आबादी करीब 10 लाख के आसपास है, रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण देश माना जाता है। यह देश लाल सागर और अदन की खाड़ी के बीच स्थित है, जो वैश्विक व्यापार और समुद्री मार्गों के लिए अहम केंद्र है। इसी कारण यहां अमेरिका, चीन, फ्रांस और जापान जैसे कई देशों के सैन्य ठिकाने मौजूद हैं, जो इसकी अंतरराष्ट्रीय अहमियत को और बढ़ाते हैं।

इस चुनाव में गुएल्लेह के सामने केवल एक ही उम्मीदवार था—मोहम्मद फराह समातर—जो अपेक्षाकृत कमजोर चुनौती पेश कर पाए। कई प्रमुख विपक्षी दलों ने चुनाव का बहिष्कार किया, जिससे मुकाबला एकतरफा हो गया। विश्लेषकों का मानना है कि विपक्ष की गैरमौजूदगी और सीमित प्रतिस्पर्धा ने गुएल्लेह की जीत को और आसान बना दिया।

गौरतलब है कि 2025 में जिबूती की संसद ने राष्ट्रपति पद के लिए अधिकतम आयु सीमा को हटा दिया था, जिसके बाद 78 वर्षीय गुएल्लेह के लिए फिर से चुनाव लड़ने का रास्ता साफ हो गया। इससे पहले यह नियम उन्हें छठी बार चुनाव लड़ने से रोक सकता था।

हालांकि सरकार ने चुनाव को शांतिपूर्ण और सफल बताया है, लेकिन मानवाधिकार संगठनों और विपक्षी दलों ने निष्पक्षता पर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि देश में राजनीतिक स्वतंत्रता सीमित है और विरोधियों पर दबाव बनाया जाता है। सरकार इन आरोपों से इनकार करती रही है और खुद को स्थिरता व विकास का प्रतीक बताती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि जिबूती की स्थिरता और उसकी रणनीतिक स्थिति के कारण अंतरराष्ट्रीय शक्तियां वहां राजनीतिक व्यवस्था में ज्यादा हस्तक्षेप नहीं करतीं। देश की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से बंदरगाह सेवाओं और विदेशी सैन्य अड्डों से होने वाली आय पर निर्भर है, जो उसे क्षेत्रीय स्तर पर एक अहम केंद्र बनाती है।

इस जीत के साथ गुएल्लेह ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि जिबूती की राजनीति में उनका दबदबा अभी भी कायम है। हालांकि लोकतंत्र और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को लेकर उठ रहे सवाल भविष्य में इस देश की राजनीति को नई दिशा दे सकते हैं।

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