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होर्मुज जलडमरूमध्य खुलेगा, परमाणु हथियार नहीं बनाएगा ईरान; ट्रंप-पेजेशकियन के 14 सूत्रीय शांति समझौते से बदलेगी मध्य पूर्व की तस्वीर

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अमेरिका और ईरान के बीच वर्षों से चले आ रहे तनाव को कम करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने 14 सूत्रीय शांति समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। इस समझौते को मध्य पूर्व में स्थिरता बहाल करने की दिशा में बड़ी कूटनीतिक सफलता माना जा रहा है। समझौते के तहत ईरान ने परमाणु हथियार विकसित नहीं करने, अंतरराष्ट्रीय निगरानी व्यवस्था के साथ सहयोग करने और वैश्विक व्यापार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने पर सहमति जताई है।

समझौते का सबसे महत्वपूर्ण पहलू होर्मुज जलडमरूमध्य को अंतरराष्ट्रीय जहाजरानी के लिए खोलना है। यह समुद्री मार्ग दुनिया के तेल व्यापार का एक बड़ा हिस्सा संभालता है और पिछले कई महीनों से यहां तनाव के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार प्रभावित हो रहे थे। जलडमरूमध्य के खुलने से तेल आपूर्ति सामान्य होने की उम्मीद बढ़ी है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अस्थिरता कम हो सकती है। ट्रंप ने भी इस समझौते को वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए राहत भरा कदम बताते हुए कहा कि इससे संभावित आर्थिक संकट को टालने में मदद मिलेगी।

समझौते में ईरान को आर्थिक राहत देने के लिए एक विशाल 300 अरब डॉलर के पुनर्निर्माण और विकास कोष का प्रस्ताव भी शामिल किया गया है। बताया गया है कि यह कोष मुख्य रूप से निजी निवेश और खाड़ी क्षेत्र के सहयोगी देशों की भागीदारी से तैयार किया जाएगा। इसके अलावा ईरान को तेल निर्यात में राहत, कुछ प्रतिबंधों में ढील और विदेशों में जमा उसकी बड़ी मात्रा में जमी हुई संपत्तियों तक चरणबद्ध पहुंच देने की भी रूपरेखा बनाई गई है। हालांकि इन सभी लाभों को ईरान द्वारा समझौते की शर्तों का पालन करने से जोड़ा गया है।

परमाणु कार्यक्रम को लेकर भी इस समझौते में महत्वपूर्ण प्रावधान किए गए हैं। ईरान ने स्पष्ट रूप से परमाणु हथियार विकसित नहीं करने का वादा किया है। इसके साथ ही उसके परमाणु कार्यक्रम पर अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की निगरानी बढ़ाने और संवेदनशील गतिविधियों पर नियंत्रण की व्यवस्था प्रस्तावित की गई है। अमेरिका का दावा है कि यह समझौता ईरान को परमाणु हथियारों की दिशा में आगे बढ़ने से रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

इस समझौते को लेकर दुनिया भर में मिश्रित प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। कई देशों ने इसे तनाव कम करने और शांति स्थापित करने की दिशा में सकारात्मक कदम बताया है, जबकि कुछ आलोचकों का कहना है कि ईरान को आर्थिक लाभ देने के बदले पर्याप्त कठोर शर्तें नहीं रखी गई हैं। इजरायल और अमेरिका के कुछ राजनीतिक समूहों ने भी समझौते पर सवाल उठाए हैं। उनका मानना है कि इससे ईरान को क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ाने का अवसर मिल सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता केवल अमेरिका और ईरान के रिश्तों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका असर वैश्विक ऊर्जा बाजार, पश्चिम एशिया की सुरक्षा व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर भी दिखाई देगा। आने वाले 60 दिनों को इस समझौते के लिए सबसे अहम माना जा रहा है, क्योंकि इसी अवधि में दोनों देशों को कई संवेदनशील मुद्दों पर आगे की बातचीत पूरी करनी होगी। यदि यह प्रक्रिया सफल रहती है तो मध्य पूर्व में लंबे समय से चली आ रही अस्थिरता को कम करने की दिशा में यह एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है।

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