भारत निर्वाचन आयोग के भीतर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी के बीच मतभेदों को लेकर सामने आई रिपोर्ट ने चुनाव प्रक्रिया और मतदाता सूची के प्रबंधन पर बहस तेज कर दी है। रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों चुनाव आयुक्तों ने पिछले करीब 10 महीनों में आयोग के कई फैसलों और प्रक्रियाओं पर कम से कम 14 बार औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई। इन आपत्तियों का संबंध नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाने और बहाल करने, अपील दाखिल करने तथा चुनावी डेटा तक अधिकारियों की पहुंच जैसे मुद्दों से बताया गया है।
विवाद का एक प्रमुख केंद्र विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR और उससे जुड़ा डिजिटल सिस्टम ECINet है। जनवरी 2026 में लॉन्च किए गए ECINet को चुनाव से जुड़ी विभिन्न डिजिटल सेवाओं को एक प्लेटफॉर्म पर लाने के लिए तैयार किया गया था। चुनाव आयोग ने इसके लॉन्च के समय कहा था कि प्लेटफॉर्म कानून के अनुरूप विकसित किया गया है। हालांकि, रिपोर्ट के अनुसार संधू और जोशी ने बाद में चुनावी डेटा के धीरे-धीरे केंद्रीकरण और राज्य स्तर के अधिकारियों की पहुंच को लेकर चिंता जताई।
रिपोर्ट के मुताबिक, मई 2026 में चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने चुनावी डेटाबेस के कथित केंद्रीकरण को लेकर सवाल उठाया और सुझाव दिया कि किसी बाहरी विशेषज्ञ संस्था की मदद से सिस्टम का ऑडिट कराया जाए। उनका कहना था कि यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि मतदाता डेटाबेस में बदलाव करने की अनुमति केवल उन्हीं वैधानिक अधिकारियों के पास हो, जिन्हें कानून के तहत यह अधिकार दिया गया है। बाद में संधू ने भी राज्य स्तर के अधिकारियों द्वारा सिस्टम तक पूरी पहुंच नहीं होने की शिकायत दर्ज की।
नए मतदाताओं के लिए इस्तेमाल होने वाले Form-6 को लेकर भी दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्ति सामने आई। रिपोर्ट के अनुसार, ECINet पर Form-6 में SIR से जुड़ा एक अतिरिक्त सवाल जोड़ा गया था, जिसमें आवेदक से उसके या उसके माता-पिता अथवा दादा-दादी का नाम पिछली SIR की मतदाता सूची में होने के बारे में जानकारी मांगी जा रही थी। जोशी ने कथित तौर पर इस बदलाव के लिए नियमों में संशोधन की जरूरत बताई थी, जबकि संधू ने भी बाद में इसे अधिकृत प्रक्रिया के बिना किया गया बदलाव बताया।
पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से जुड़े मामलों को लेकर भी सवाल उठाए गए। रिपोर्ट के अनुसार, SIR के दौरान हटाए गए नामों और बाद में न्यायिक प्रक्रिया के तहत बहाल किए गए मतदाताओं से संबंधित फैसलों के खिलाफ अपील दाखिल करने की प्रक्रिया पर संधू ने अधिकारियों से जानकारी मांगी थी। उन्होंने यह सवाल उठाया कि इन अपीलों को निर्वाचन आयोग की ओर से दाखिल करने की अनुमति किसने दी और इसकी प्रक्रिया क्या थी। रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने कहा कि इस संबंध में उन्हें और जोशी को पूरी जानकारी नहीं दी गई थी।
गोवा में भी सॉफ्टवेयर से जुड़ी एक समस्या का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, SIR के दौरान कुछ मतदाताओं के नामों में तकनीकी या रिकॉर्ड संबंधी विसंगतियां सामने आई थीं। स्थानीय निर्वाचन अधिकारियों ने सुनवाई के बाद 97 मतदाताओं को अंतिम सूची में शामिल करने योग्य पाया, लेकिन सॉफ्टवेयर में पहले हटाए गए नामों को वापस दर्ज करने की सुविधा समय पर उपलब्ध नहीं हो सकी। रिपोर्ट के मुताबिक, इससे ये मतदाता अंतिम सूची में शामिल नहीं हो पाए।
इस पूरे मामले में निर्वाचन आयोग ने अलग तस्वीर पेश की है। आयोग ने कहा है कि पिछले 10 महीनों में उसके फैसले सर्वसम्मति से लिए गए और अलग-अलग आंतरिक टिप्पणियों को पूरे निर्णय लेने की प्रक्रिया का प्रतिनिधि नहीं माना जाना चाहिए। आयोग की ओर से जारी प्रतिक्रिया पर तीनों चुनाव आयुक्तों के हस्ताक्षर होने की बात भी सामने आई है। यानी जहां कुछ रिपोर्टों में आंतरिक असहमति और औपचारिक आपत्तियों का उल्लेख है, वहीं आयोग का कहना है कि अंतिम निर्णयों में संस्थागत स्तर पर सहमति बनी रही।
कानूनी रूप से निर्वाचन आयोग संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत काम करता है और इसमें मुख्य चुनाव आयुक्त तथा दो चुनाव आयुक्त होते हैं। 2023 के संबंधित कानून के अनुसार आयोग के कामकाज को जहां तक संभव हो, सर्वसम्मति से संचालित किया जाना चाहिए। यदि किसी विषय पर सदस्यों की राय अलग होती है, तो बहुमत के आधार पर फैसला किया जा सकता है। इसी व्यवस्था के संदर्भ में आयोग के भीतर दर्ज की गई आपत्तियों और अंतिम फैसलों के बीच अंतर को लेकर चर्चा बढ़ी है।
फिलहाल विवाद का बड़ा सवाल यही है कि आयोग के भीतर दर्ज की गई इन आपत्तियों का प्रशासनिक और कानूनी स्तर पर क्या प्रभाव पड़ा और ECINet तथा SIR से जुड़े निर्णयों में वैधानिक अधिकारियों की भूमिका किस तरह निर्धारित की गई। चुनाव आयोग ने अपने स्तर पर निर्णय प्रक्रिया को सर्वसम्मत बताया है, जबकि सामने आई रिपोर्टों में दो चुनाव आयुक्तों की ओर से दर्ज की गई विस्तृत आपत्तियों का उल्लेख है। ऐसे में मतदाता डेटा की सुरक्षा, डिजिटल सिस्टम की पारदर्शिता और चुनावी प्रक्रिया में जिम्मेदारियों के बंटवारे को लेकर बहस जारी है।
