फ्रांस में राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन लगातार जारी हैं। बढ़ती महंगाई, जीवनयापन की लागत, वेतन और सार्वजनिक सेवाओं की स्थिति को लेकर लोगों में नाराजगी बढ़ रही है। सरकार की ओर से शांति बनाए रखने की अपील और प्रदर्शनकारियों से बातचीत की कोशिशों के बावजूद असंतोष कम होता नहीं दिख रहा। 24 अक्टूबर को देशभर में हुए प्रदर्शनों के दौरान कई शहरों में तनाव और झड़पों की खबरें सामने आईं।
फ्रांस के गृह मंत्रालय के मुताबिक, शनिवार को देशभर में करीब 4 लाख 10 हजार लोगों ने प्रदर्शनों में हिस्सा लिया। हालांकि, ट्रेड यूनियनों का दावा था कि प्रदर्शनकारियों की संख्या लगभग 8 लाख तक रही। राजधानी पेरिस में भी बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतरे। प्रदर्शन मुख्य रूप से महंगाई, आर्थिक असमानता और सरकारी सेवाओं में गिरावट के विरोध में आयोजित किए गए थे।
प्रदर्शन कई जगहों पर शांतिपूर्ण तरीके से शुरू हुए, लेकिन कुछ शहरों में बाद में हालात बिगड़ गए। पेरिस और मार्सेई समेत कई स्थानों पर पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पें हुईं। कुछ जगहों पर दुकानों में तोड़फोड़ और लूटपाट की घटनाएं भी सामने आईं। पुलिस ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए आंसू गैस और वाटर कैनन का इस्तेमाल किया। अधिकारियों के अनुसार, हिंसा की घटनाओं में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई की गई।
प्रदर्शनों को देखते हुए फ्रांस में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई थी। अधिकारियों ने देशभर में लगभग 70 हजार पुलिसकर्मियों और जेंडरमेरी के जवानों को तैनात किया। गृह मंत्रालय के मुताबिक, शनिवार को हुई कार्रवाई के दौरान 1,314 लोगों को गिरफ्तार किया गया। करीब 50 पुलिसकर्मी घायल भी हुए। सुरक्षा बलों की बड़ी तैनाती का उद्देश्य पिछले सप्ताह हुई व्यापक हिंसा, लूटपाट और सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने की घटनाओं को दोबारा होने से रोकना था।
इस आंदोलन की शुरुआत सितंबर में स्कूलों की खराब स्थिति और शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी शिकायतों के बीच हुई थी। छात्रों ने स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की कमी, शिक्षकों की कमी और उच्च शिक्षा में प्रवेश की व्यवस्था को लेकर विरोध जताया था। धीरे-धीरे यह आंदोलन व्यापक सामाजिक असंतोष में बदल गया और इसमें कर्मचारियों, शिक्षकों, ट्रेड यूनियनों तथा अन्य वर्गों के लोगों की भागीदारी बढ़ने लगी।
प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांगों में बेहतर वेतन, महंगाई से राहत, स्वास्थ्य और शिक्षा सेवाओं में सुधार तथा सरकारी नीतियों में बदलाव शामिल हैं। कई प्रदर्शनकारी सरकार पर आम लोगों की आर्थिक परेशानियों को पर्याप्त महत्व नहीं देने का आरोप लगा रहे हैं। वहीं, सरकार ने हिंसा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की घटनाओं की आलोचना की है। मैक्रों ने शांति बनाए रखने और कानून-व्यवस्था बहाल करने पर जोर दिया है, जबकि विरोध करने वाले समूहों का कहना है कि उनकी मांगों पर ठोस कदम उठाए जाने चाहिए।
मैक्रों सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती यह भी है कि फ्रांस की सार्वजनिक वित्तीय स्थिति दबाव में है और संसद में उनकी राजनीतिक स्थिति पहले जैसी मजबूत नहीं है। ऐसे में प्रदर्शनकारियों की मांगों को पूरा करने के लिए बड़े आर्थिक फैसले लेना आसान नहीं माना जा रहा। सरकार ने छात्र प्रतिनिधियों और ट्रेड यूनियनों के साथ बातचीत की कोशिश की है, लेकिन प्रदर्शनकारी संगठनों का कहना है कि अब तक हुई चर्चा से उनकी चिंताओं का समाधान नहीं हुआ है।
विरोध आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए ट्रेड यूनियनों और अन्य समूहों ने नए कार्यक्रमों की घोषणा की है। प्रदर्शनकारियों ने 31 अक्टूबर को फिर से सड़कों पर उतरने की तैयारी जताई है, जबकि 5 नवंबर को देशव्यापी हड़ताल का आह्वान किया गया है। येलो वेस्ट आंदोलन से जुड़े कुछ समूहों ने भी आगामी प्रदर्शनों में शामिल होने की बात कही है। इससे आने वाले दिनों में फ्रांस के कई शहरों में फिर से बड़े प्रदर्शन होने की संभावना बनी हुई है।
फिलहाल फ्रांस में राजनीतिक और सामाजिक तनाव बना हुआ है। एक ओर सरकार कानून-व्यवस्था बनाए रखने और हिंसा रोकने की कोशिश कर रही है, वहीं दूसरी ओर प्रदर्शनकारी महंगाई, वेतन और सार्वजनिक सेवाओं से जुड़े मुद्दों पर ठोस कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। आने वाले दिनों में सरकार और यूनियनों के बीच बातचीत तथा प्रस्तावित हड़ताल पर सबकी नजर रहेगी। यह देखना अहम होगा कि क्या बातचीत से तनाव कम होता है या विरोध प्रदर्शन और व्यापक रूप लेते हैं।
