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Gen Z की शिक्षा व्यवस्था में बदलाव की तैयारी, नंदन नीलेकणी की टास्क फोर्स के सामने 5 बड़ी चुनौतियां

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देश में NEET-UG पेपर लीक विवाद और परीक्षा प्रणाली को लेकर उठे व्यापक सवालों के बाद केंद्र सरकार शिक्षा व्यवस्था में बड़े बदलाव की दिशा में आगे बढ़ रही है। इसी क्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इंफोसिस के सह-संस्थापक और तकनीकी विशेषज्ञ नंदन नीलेकणी की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय टास्क फोर्स का गठन किया है। केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार संभाल रहे प्रह्लाद जोशी ने भी स्पष्ट किया है कि नई पीढ़ी यानी Gen Z की अपेक्षाओं के अनुरूप शिक्षा और परीक्षा प्रणाली को अधिक पारदर्शी, तकनीक आधारित और भरोसेमंद बनाना सरकार की प्राथमिकता होगी। इस टास्क फोर्स का उद्देश्य केवल पेपर लीक जैसी घटनाओं को रोकना नहीं, बल्कि पूरे परीक्षा तंत्र में व्यापक सुधार का रोडमैप तैयार करना है।

टास्क फोर्स के सामने सबसे बड़ी चुनौती देश की सार्वजनिक परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता को दोबारा स्थापित करना है। पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक और अनियमितताओं के आरोपों ने छात्रों और अभिभावकों का भरोसा कमजोर किया है। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि केवल सख्त कानून पर्याप्त नहीं होंगे, बल्कि परीक्षा प्रक्रिया को इस तरह विकसित करना होगा कि उसमें तकनीकी सुरक्षा, पारदर्शिता और जवाबदेही एक साथ सुनिश्चित हो सके। सरकार भी इसी दिशा में अधिकतम तकनीक के उपयोग पर जोर दे रही है।

दूसरी बड़ी चुनौती डिजिटल सुरक्षा और साइबर इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत बनाना है। आज अधिकांश परीक्षाएं डिजिटल प्रक्रियाओं पर निर्भर होती जा रही हैं, ऐसे में प्रश्नपत्र तैयार करने से लेकर उनके सुरक्षित वितरण और परीक्षा संचालन तक हर चरण को अत्याधुनिक तकनीक से सुरक्षित करना आवश्यक माना जा रहा है। टास्क फोर्स से अपेक्षा की जा रही है कि वह ऐसे उपाय सुझाए जिससे डेटा चोरी, हैकिंग, पेपर लीक और संगठित परीक्षा माफिया जैसी समस्याओं पर प्रभावी नियंत्रण लगाया जा सके। इसके साथ ही परीक्षा केंद्रों की निगरानी, डिजिटल ट्रैकिंग और आधुनिक सुरक्षा प्रणालियों को भी और मजबूत बनाने की योजना तैयार की जाएगी।

तीसरी चुनौती परीक्षा प्रणाली को अधिक छात्र-केंद्रित बनाना है। वर्तमान समय की Gen Z केवल अंकों पर आधारित मूल्यांकन के बजाय कौशल, नवाचार, तार्किक सोच और वास्तविक क्षमता को महत्व देती है। इसलिए विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य की परीक्षा प्रणाली में केवल रटकर उत्तर देने के बजाय विश्लेषणात्मक सोच, समस्या समाधान और व्यावहारिक ज्ञान का अधिक आकलन किया जाना चाहिए। नई व्यवस्था में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), डिजिटल लर्निंग और आधुनिक मूल्यांकन पद्धतियों को भी शामिल करने पर विचार किया जा सकता है, ताकि छात्रों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के अनुरूप तैयार किया जा सके।

चौथी चुनौती राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (NTA) और अन्य परीक्षा संस्थाओं में संरचनात्मक सुधार लागू करना है। सरकार चाहती है कि परीक्षा आयोजन की पूरी प्रक्रिया अधिक पेशेवर, पारदर्शी और समयबद्ध हो। इसके लिए लॉजिस्टिक्स, परीक्षा केंद्रों का प्रबंधन, निगरानी तंत्र, शिकायत निवारण प्रणाली और प्रशासनिक जवाबदेही जैसे पहलुओं की व्यापक समीक्षा की जाएगी। इसी उद्देश्य से टास्क फोर्स में पूर्व इसरो प्रमुख एस. सोमनाथ, पूर्व आईबी निदेशक तपन डेका, आईआईटी मद्रास के निदेशक वी. कामाकोटी, पूर्व शिक्षा सचिव अनीता करवाल और अन्य विशेषज्ञों को भी शामिल किया गया है, ताकि विभिन्न क्षेत्रों के अनुभवों का लाभ मिल सके।

पांचवीं और सबसे महत्वपूर्ण चुनौती शिक्षा व्यवस्था को भविष्य की जरूरतों के अनुरूप बनाना है। तेजी से बदलती तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रोजगार बाजार की नई मांगों को देखते हुए केवल परीक्षा प्रणाली में बदलाव पर्याप्त नहीं होगा। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि पाठ्यक्रम, मूल्यांकन प्रणाली, कौशल विकास और रोजगारोन्मुखी शिक्षा के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करना भी जरूरी है। यदि परीक्षा प्रणाली निष्पक्ष होगी और शिक्षा रोजगार की जरूरतों से जुड़ सकेगी, तभी छात्रों का विश्वास पूरी तरह बहाल हो पाएगा और देश की युवा आबादी अपनी क्षमता का बेहतर उपयोग कर सकेगी।

सरकार का कहना है कि टास्क फोर्स अपनी सिफारिशें सौंपने के बाद परीक्षा प्रणाली में चरणबद्ध तरीके से सुधार लागू किए जाएंगे। इसके साथ ही संसद में पेपर लीक के खिलाफ सख्त कानूनी प्रावधानों वाला संशोधन विधेयक भी लाया जा रहा है। माना जा रहा है कि यदि तकनीकी सुधार, प्रशासनिक जवाबदेही और कानूनी सख्ती को प्रभावी ढंग से लागू किया गया, तो आने वाले वर्षों में भारत की परीक्षा प्रणाली अधिक सुरक्षित, पारदर्शी और छात्रों के हितों के अनुरूप बन सकेगी।

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