देश की राजनीति में एक बड़ा संवैधानिक विवाद सामने आया है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के नेतृत्व में विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी शुरू कर दी है। सूत्रों के अनुसार विपक्षी दल इस मुद्दे पर एकजुट होकर संसद के मौजूदा सत्र में प्रस्ताव पेश करने की रणनीति बना रहे हैं। इस कदम को भारतीय राजनीति में बेहद अहम माना जा रहा है क्योंकि मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया बहुत दुर्लभ और जटिल मानी जाती है।
बताया जा रहा है कि संसद भवन में हुई विपक्षी दलों की बैठक में कांग्रेस नेता राहुल गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव सहित कई दलों के नेताओं ने इस मुद्दे पर चर्चा की। बैठक में तृणमूल कांग्रेस की ओर से प्रतिनिधियों ने यह आरोप लगाया कि पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची की समीक्षा प्रक्रिया के दौरान कई गड़बड़ियां हुई हैं और बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं। इसी विवाद को आधार बनाकर मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ कार्रवाई की मांग उठाई जा रही है।
दरअसल पश्चिम बंगाल में SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाए जाने को लेकर राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी तृणमूल कांग्रेस और चुनाव आयोग के बीच लंबे समय से टकराव चल रहा है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी पार्टी का आरोप है कि इस प्रक्रिया के जरिए विपक्षी समर्थकों के वोट काटे जा रहे हैं। वहीं चुनाव आयोग ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि सूची की जांच का उद्देश्य केवल गलत या अवैध प्रविष्टियों को हटाना है।
सूत्रों के मुताबिक महाभियोग प्रस्ताव का ड्राफ्ट तैयार करने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और इसके लिए सांसदों के हस्ताक्षर जुटाए जा रहे हैं। संसद में इसे पेश करने के लिए कम से कम 100 लोकसभा सांसदों या 50 राज्यसभा सांसदों के समर्थन की आवश्यकता होती है। यदि प्रस्ताव स्वीकार हो जाता है तो इसके बाद जांच और मतदान की प्रक्रिया होती है, जिसमें दोनों सदनों में विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित होने पर ही मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाया जा सकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह कदम विपक्ष की एक बड़ी राजनीतिक रणनीति भी हो सकता है। आने वाले समय में कई राज्यों में चुनाव होने वाले हैं और ऐसे में चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। हालांकि संवैधानिक प्रावधानों के कारण मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाना बेहद कठिन प्रक्रिया है और इसके लिए संसद में व्यापक समर्थन जरूरी होता है।
फिलहाल यह मुद्दा भारतीय राजनीति में नई बहस का कारण बन गया है। एक ओर विपक्ष चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठा रहा है, वहीं सत्तारूढ़ दल और आयोग का कहना है कि चुनावी प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और नियमों के अनुसार चल रही है। आने वाले दिनों में संसद के भीतर और बाहर इस मुद्दे पर राजनीतिक टकराव और तेज होने की संभावना है।
