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सूखे की मार से भारत में बढ़ सकता है खाद्य तेल, सोयाबीन और मक्का का आयात, अंडे-दूध-चिकन महंगे होने की आशंका

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देश के कई हिस्सों में सूखे और कमजोर मानसून के कारण फसलों को नुकसान पहुंचने की आशंका है। इसका असर अब खाद्य पदार्थों, पशु आहार और कृषि उद्योग से जुड़े कच्चे माल की आपूर्ति पर भी पड़ सकता है। वित्त वर्ष 2026-27 में भारत को घरेलू मांग पूरी करने के लिए खाद्य तेल, सोयाबीन, मक्का और अन्य कृषि उत्पादों का आयात बढ़ाना पड़ सकता है। हालांकि, आयात में वास्तविक बढ़ोतरी कितनी होगी, यह घरेलू उत्पादन और आने वाली फसलों की स्थिति पर निर्भर करेगा।

सूखे की वजह से खरीफ सीजन की सोयाबीन और मूंगफली की फसल पर खास दबाव बताया जा रहा है। मराठवाड़ा, विदर्भ, तेलंगाना और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में सोयाबीन की फसल प्रभावित हुई है। पिछले साल भी अत्यधिक बारिश के कारण सोयाबीन उत्पादन को नुकसान पहुंचा था। लगातार मौसम संबंधी चुनौतियों से घरेलू बाजार में तिलहन की उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ी है, जिसका असर खाद्य तेलों की आपूर्ति पर पड़ सकता है।

खाद्य तेल के आयात में बढ़ोतरी का अनुमान भी सामने आया है। उद्योग से जुड़े एक अनुमान के मुताबिक, भारत का खाद्य तेल आयात वित्त वर्ष 2025-26 के 1.65 करोड़ टन से बढ़कर 2026-27 में 1.75 करोड़ टन तक पहुंच सकता है। हालांकि, यह अंतिम आंकड़ा नहीं है। सर्दियों में होने वाली सरसों की फसल का उत्पादन भी आयात की जरूरत तय करने में अहम भूमिका निभाएगा।

पोल्ट्री उद्योग के लिए सोयाबीन की खली और मक्का की बढ़ती कीमतें बड़ी चुनौती बन रही हैं। कंपाउंड लाइवस्टॉक फीड मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष दिव्य कुमार गुलाटी के अनुसार, उद्योग ने सरकार से 30 लाख टन सोयाबीन मील के आयात की अनुमति मांगी है। पोल्ट्री फीड में सोयाबीन मील और मक्का की संयुक्त हिस्सेदारी करीब 80 प्रतिशत बताई गई है। इन दोनों की लागत बढ़ने से मुर्गीपालन कारोबार पर दबाव पड़ सकता है।

पशु आहार महंगा होने का असर केवल पोल्ट्री कारोबार तक सीमित नहीं रह सकता। यदि चारे की लागत लंबे समय तक ऊंची बनी रहती है, तो अंडे और चिकन की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। डेयरी क्षेत्र की लागत भी प्रभावित हो सकती है, हालांकि दूध, अंडे और चिकन के खुदरा दाम कितने बढ़ेंगे, यह उत्पादन, मांग और बाजार की स्थिति पर निर्भर करेगा।

मूंगफली की फसल को लेकर भी चिंता है। सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन के नवीनतम अनुमान के हवाले से खरीफ सीजन में मूंगफली उत्पादन में 20 प्रतिशत से अधिक गिरावट की आशंका जताई गई है। यदि घरेलू तिलहन उत्पादन कमजोर रहता है, तो खाद्य तेल की जरूरत पूरी करने के लिए विदेशों से खरीद बढ़ानी पड़ सकती है। पिछले साल बारिश से फसल प्रभावित होने के बाद अफ्रीका के कम विकसित देशों से भारत का सोयाबीन आयात भी रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने की बात कही गई है।

कृषि से जुड़े अन्य उद्योग भी आयात नियमों में राहत की मांग कर रहे हैं। चीनी उद्योग को कच्ची चीनी के आयात की समयसीमा बढ़ाए जाने से राहत मिली है। वहीं, कपड़ा निर्माता कपास पर आयात शुल्क हटाने की मांग कर रहे हैं। दूसरी ओर, यदि मक्का का ज्यादा इस्तेमाल इथेनॉल बनाने में होता है, तो स्टार्च उद्योग को अपनी जरूरत पूरी करने के लिए चीन से अधिक स्टार्च आयात करना पड़ सकता है।

इन परिस्थितियों के बीच अल नीनो और बारिश की कमी को लेकर चिंता बनी हुई है। यदि घरेलू फसलों का उत्पादन मांग से कम रहता है, तो भारत की आयात पर निर्भरता बढ़ सकती है। इससे किसानों, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग, पशुपालकों और आम उपभोक्ताओं पर अलग-अलग तरह का असर पड़ सकता है। फिलहाल, खाद्य तेल और पशु आहार के आयात में संभावित बढ़ोतरी के अनुमान सामने आए हैं, लेकिन आने वाले महीनों में फसल उत्पादन और सरकारी नीतियां तय करेंगी कि आयात की वास्तविक जरूरत कितनी होगी।

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