भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच ऐतिहासिक फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) पर सहमति बन चुकी है, जिसे दोनों पक्षों ने “मदर ऑफ ऑल डील्स” यानी सभी व्यापारिक समझौतों का सबसे बड़ा करार बताया है। यह समझौता लगभग दो दशक लंबी वार्ताओं के बाद हासिल हुआ है और वैश्विक व्यापार पर इसका गहरा असर पड़ेगा। यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की टैरिफ-नीतियों के कारण भारत और अन्य देशों को गंभीर आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ रहा है।
इस एफटीए के तहत भारत और EU के बीच लगभग 96.6% उत्पादों पर टैरिफ में कटौती या समाप्ति का प्रावधान किया गया है, जिससे दोनों तरफ के व्यापार को सस्ते आयात-निर्यात का मार्ग मिलेगा। उदाहरण के लिए, भारत की टेक्सटाइल, चमड़ा, समुद्री उत्पाद, रसायन, रत्न-आभूषण जैसे क्षेत्रों को यूरोपीय बाजार में ड्यूटी-फ्री पहुंच मिलेगी। इससे भारतीय उत्पादों की मांग और प्रतिस्पर्धात्मकता में उल्लेखनीय वृद्धि की उम्मीद है।
ईयू के लिए भी यह समझौता बड़ी बाज़ार पहुंच उपलब्ध कराता है। यूरोपीय कारों, मशीनरी, दवाओं, शराब और बीयर पर अब भारत में पहले से मौजूद ऊँचे टैरिफ कम होंगे, जिससे ये वस्तुएँ भारतीय उपभोक्ताओं के लिए और भी सस्ती हो सकती हैं। इससे न केवल यूरोपीय कंपनियों को भारत के विशाल उपभोक्ता बाजार में विस्तार का अवसर मिलेगा, बल्कि इससे यूरोपीय निर्यात भी बढ़ने की संभावनाएँ बनेंगी।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह समझौता वैश्विक व्यापार में डाइवर्सिफिकेशन की दिशा में एक बड़ा कदम है। अमेरिका के साथ व्यापार पर बढ़ते तनाव और वहाँ लगाए गए उच्च टैरिफ के विकल्प के रूप में भारत ने यूरोप को एक भरोसेमंद साझेदार के रूप में चुना है। अमेरिका में ट्रंप प्रशासन द्वारा भारत पर टैरिफ बढ़ाने के प्रयासों को अब प्रभावी रूप से टाला जा सकता है क्योंकि भारत के पास यूरोपीय बाजार जैसी बड़ी वैकल्पिक साझेदारी मौजूद है।
भारत के व्यापार अनुसंधान के आंकड़ों के अनुसार, भारत-EU के बीच पहले से ही दोनों तरफ का व्यापार लगभग $136.5 बिलियन से अधिक का है। एफटीए लागू होने के बाद 99% से अधिक भारतीय निर्यात को ड्यूटी-फ्री प्रवेश मिलेगा, जिससे निर्यात में वृद्धि और रोजगार के अवसर भी बढ़ सकते हैं। इसके साथ ही सेवाओं के क्षेत्र में भी भारतीय पेशेवरों को यूरोपीय बाजार में बेहतर अवसर मिलेंगे।
हालांकि यह समझौता अब सिर्फ राजनीतिक घोषणा चरण में है और इसके लागू होने के लिए भारत और EU देशों में विधायी मंज़ूरी की प्रक्रियाएँ बाकी हैं, लेकिन व्यापार विश्लेषकों का मानना है कि यह भारत के लिए रणनीतिक सफलता है। इससे भारत की वैश्विक निर्यात संभावनाएँ मजबूत होंगी, विदेशी निवेश आकर्षित होगा और अमेरिका-केंद्रित व्यापार निर्भरता कम होगी।
कुल मिलाकर यह समझौता भारत और यूरोपीय संघ दोनों को फायदे में रखता है, लेकिन उसके व्यापक प्रभाव से ट्रंप प्रशासन की संरक्षणवादी नीतियाँ कम असर दिखाती हैं, और वैश्विक व्यापार पर अमेरिका-की निर्भरता कम होती दिखाई दे रही है।
