पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ने की आशंका बढ़ गई है। अगर क्षेत्र में तनाव अगले वित्त वर्ष तक बना रहता है, तो भारत की वास्तविक GDP वृद्धि दर के अनुमान में करीब एक प्रतिशत अंक तक की कमी आ सकती है। वहीं, खुदरा महंगाई दर में लगभग 1.5 प्रतिशत अंक की बढ़ोतरी होने का जोखिम है। EY की इकोनॉमी वॉच रिपोर्ट में यह आशंका जताई गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, ऊर्जा की बढ़ती कीमतें और वैश्विक आपूर्ति व्यवस्था में आने वाली रुकावटें भारत की आर्थिक वृद्धि के लिए चुनौती बन सकती हैं।
EY ने फरवरी 2026 की अपनी रिपोर्ट में वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की आर्थिक वृद्धि दर 6.8 से 7.2 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया था। लेकिन पश्चिम एशिया में संघर्ष लंबा खिंचने की स्थिति में इस अनुमान पर दबाव पड़ सकता है। इसका असर सिर्फ आर्थिक वृद्धि तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि कारोबार, निवेश, रोजगार और आम लोगों की खर्च करने की क्षमता पर भी पड़ सकता है। हालांकि, रिपोर्ट में बताई गई गिरावट एक संभावित जोखिम का आकलन है, न कि वृद्धि दर में कटौती का अंतिम या निश्चित आंकड़ा।
भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता कच्चे तेल की कीमतों को लेकर है। देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने पर आयात बिल बढ़ सकता है। इससे परिवहन, उत्पादन और माल की ढुलाई की लागत पर असर पड़ता है। कंपनियां अगर बढ़ी हुई लागत का कुछ हिस्सा ग्राहकों पर डालती हैं, तो कई वस्तुओं और सेवाओं के दाम बढ़ सकते हैं। इस तरह ऊर्जा बाजार में आने वाला झटका धीरे-धीरे घरेलू महंगाई तक पहुंच सकता है।
रिपोर्ट में अनुमान जताया गया है कि खुदरा महंगाई अपने मूल अनुमान सात प्रतिशत से ऊपर जा सकती है, यानी इसमें करीब 1.5 प्रतिशत अंक तक की बढ़ोतरी का जोखिम है। तेल और ऊर्जा की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहने से उत्पादन तथा परिवहन महंगा हो सकता है। इसका असर घरों के बजट पर भी पड़ सकता है, क्योंकि ईंधन और माल ढुलाई की लागत बढ़ने पर रोजमर्रा के सामान की कीमतों पर दबाव बनता है। महंगाई कितनी बढ़ेगी, यह संघर्ष की अवधि और ऊर्जा आपूर्ति की स्थिति पर निर्भर करेगा।
पश्चिम एशिया का संकट भारत के कई उद्योगों को प्रभावित कर सकता है। EY ने कपड़ा, पेंट, रसायन, उर्वरक, सीमेंट और टायर जैसे क्षेत्रों का उल्लेख किया है। इन उद्योगों में ऊर्जा, कच्चे माल और परिवहन की लागत अहम भूमिका निभाती है। अगर उत्पादन लागत बढ़ती है या आपूर्ति में बाधाएं आती हैं, तो कंपनियों के मुनाफे पर दबाव पड़ सकता है। कुछ क्षेत्रों में कारोबार धीमा होने से भर्ती, रोजगार और कर्मचारियों की आय भी प्रभावित हो सकती है, जिसका असर बाजार में मांग पर पड़ेगा।
इस पूरे संकट में होर्मुज जलडमरूमध्य का महत्व भी काफी बढ़ जाता है। यह समुद्री मार्ग वैश्विक तेल और गैस की आपूर्ति के लिए अहम है। यहां जहाजों की आवाजाही बाधित होने या जोखिम बढ़ने पर ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता पैदा हो सकती है। एशियाई देशों पर इसका असर इसलिए भी ज्यादा पड़ सकता है, क्योंकि उनकी अर्थव्यवस्थाएं ऊर्जा आयात और अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति शृंखलाओं पर काफी निर्भर हैं। भारत के लिए इस मार्ग से जुड़ी किसी भी बड़ी बाधा का मतलब महंगे आयात और आर्थिक दबाव हो सकता है।
रुपये की चाल पर भी वैश्विक तनाव का असर देखने को मिल सकता है। संकट के समय निवेशकों का रुझान बदलता है और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अनिश्चितता बढ़ने से कई मुद्राओं पर दबाव पड़ सकता है। रिपोर्ट में SBI के आकलन का हवाला देते हुए कहा गया कि पश्चिम एशिया में संघर्ष शुरू होने के बाद रुपये में आई कमजोरी अन्य वैश्विक मुद्राओं में देखी गई गिरावट से अलग नहीं थी। हालांकि, रुपये में आगे कितना उतार-चढ़ाव होगा, यह कच्चे तेल की कीमतों, विदेशी निवेश और वैश्विक बाजारों की स्थिति समेत कई कारकों पर निर्भर करेगा।
भारत की अर्थव्यवस्था पर अंतिम असर इस बात से तय होगा कि पश्चिम एशिया में संघर्ष कितने समय तक जारी रहता है और तेल-गैस की आपूर्ति कितनी जल्दी सामान्य होती है। अगर तनाव लंबा चलता है, तो आर्थिक वृद्धि में सुस्ती और महंगाई का दबाव बढ़ सकता है। वहीं, हालात में सुधार होने पर ऊर्जा बाजार को राहत मिल सकती है। फिलहाल EY की रिपोर्ट भारत के सामने मौजूद संभावित आर्थिक जोखिमों की ओर इशारा करती है। यह आकलन बताता है कि आने वाले वित्त वर्ष में वैश्विक घटनाक्रम भारत की विकास दर, महंगाई और उद्योगों की स्थिति को प्रभावित करने वाले अहम कारकों में शामिल रहेंगे।
