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2020 की दिल्ली दंगों के एक प्रमुख आरोपी एवं छात्र कार्यकर्ता शरजील इमाम ने दिल्ली की एक अदालत में

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अंतरिम जमानत (interim bail) की याचिका दायर की है, ताकि वे आगामी बिहार विधानसभा चुनावों में बहादुर्गंज निर्वाचन क्षेत्र से प्रत्याशी बन सकें।

शरजील वर्तमान में तिहाड़ जेल में बंद हैं और उन पर गंभीर आरोप हैं। अब उनकी याचिका में कहा गया है कि उन्हें 15 अक्टूबर से 29 अक्टूबर तक की अंतरिम जमानत दी जाए ताकि वे अपने नामांकन पत्र दाखिल कर सकें, चुनावी प्रचार कर सकें और पार्टी व निर्वाचन प्रक्रिया में भाग ले सकें।

उनकी याचिका दिल्ली की कार्कदूमा कोर्ट में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश समीर ब़ाजपेयी के समक्ष लगी है, जो दिल्ली दंगों की साज़िश मामले की सुनवाई कर रहे हैं। शरजील के वकील का तर्क है कि वे एक राजनीतिक बंदी हैं और छात्र कार्यकर्ता होने के नाते उन्हें चुनाव लड़ने का अधिकार होना चाहिए।

याचिका में यह भी कहा गया है कि उनकी बहादुर्गंज में नामांकन प्रक्रिया और प्रचार-प्रसार का ठोस इंतज़ाम करने के लिए उन्हें जमानत मिलना चाहिए, क्योंकि अन्य सहायक नहीं हैं—सिवाय उनके छोटे भाई के, जो उनकी बीमार मां की देखभाल के लिए भी जिम्मेदार हैं।

बहादुर्गंज, जिस सीट से शरजील चुनाव लड़ना चाहते हैं, वर्तमान में एमआईएम से विधायक मोहम्मद अंज़ार नैमी represent कर रहे हैं, जिन्होंने बाद में राजद में शामिल हो गए। इस सीट पर मतदान 11 नवम्बर को तय है।

शरजील इमाम के खिलाफ कई तरह के कानूनी मुकदमे हैं, जिनमें UAPA जैसे कठोर कानूनों के तहत आरोप शामिल हैं। उनकी पिछली नियमित जमानत याचिका दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा अस्वीकृत की गई थी, और मामला अब सुप्रीम कोर्ट में है।

यह मामला केवल कानूनी मोर्चे पर ही नहीं, राजनीतिक दृष्टि से भी संवेदनशील हो गया है। यदि अदालत उन्हें अंतरिम जमानत देती है, तो शरजील इमाम चुनाव मैदान में उतर सकते हैं — यह एक विवादास्पद मगर प्रतीकात्मक दांव होगा। दूसरी ओर, यदि उन्हें यह अनुमति न मिले, तो उनकी भागीदारी अधूरी रह सकती है।

इस तरह यह पूरा घटनाक्रम यह संकेत देता है कि न्याय और चुनावी प्रक्रिया के बीच संतुलन की लड़ाई आज भी जारी है। अदालत के इस अनुरोध पर कैसे निर्णय आता है, यह न सिर्फ शरजील इमाम के राजनीतिक भविष्य को प्रभावित करेगा, बल्कि यह लोकतंत्र, न्याय व्यवस्था और चुनावी अधिकारों पर एक बड़ा सवाल भी खड़ा करता है।

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