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साहित्य आजतक 2025 में इतिहासकारों का अहम मंथन

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दिल्ली में आयोजित ‘साहित्य आजतक 2025’ महोत्सव के दूसरे दिन एक अहम सत्र किया गया, जहाँ प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. विक्रम सम्पत और हिंदोल सेनगुप्ता ने इतिहास को सिर्फ तार्किक दस्तावेज न मानकर उसे एक भारतीय दृष्टिकोण से पुनर्परिभाषित करने की जोरदार माँग उठाई।

इस सत्र का शीर्षक था ‘भारत-एयता के नायक-खलनायक’, जिसमें दोनों इतिहासकारों ने कहा कि भारत के इतिहास की व्याख्या अब भी औपनिवेशिक संरचनाओं के दायरे में रहकर की जाती है, जबकि हमारी सभ्यता, बौद्धिक उपलब्धियाँ और सांस्कृतिक गहराई की पूरी कहानी कभी सामने नहीं आती।

डॉ. सम्पत ने यह मुद्दा उठाया कि इतिहासकारों को अक्सर ऐसे स्रोतों से काम करना पड़ता है जो सदियों की विनाश और असंतुलन के बाद ही बचे हैं। उन्होंने कहा, “हम उसी बची-खुची जानकारी से इतिहास की रूपरेखा तैयार करते हैं, और उस पर सिर्फ एक दृष्टिकोण हावी रहता आया है।” उन्होंने यह भी कहा कि कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक जीत और गाथाएँ — जो शायद रिकॉर्ड नहीं हुई थीं — आज भी हमें नहीं मालूम हैं क्योंकि उन्हें या तो दर्ज नहीं किया गया या महत्व नहीं दिया गया।

वहीं, हिंदोल सेनगुप्ता ने बताया कि भारत की आत्म-समझ अभी भी बहुत हद तक पश्चिमी नजरियों से संक्रमित है। उन्होंने कहा, “इतिहास जितना विविध है, उतनी ही हमारी एकता भी है, लेकिन हमें यह समझने में कठिनाई होती है क्योंकि हमारी कहानी को पश्चिमी फ़्रेमवर्क में ही बताया गया है।”  उन्होंने पंडित राधा कुमुद मुकुन्द मुखर्जी के विचारों का हवाला देते हुए यह तर्क दिया कि यात्रा-पथ (पिल्ग्रिमेज) और तीर्थ स्थलों ने सांस्कृतिक और भौगोलिक परिप्रेक्ष्य में भारत की मानचित्र-रचना (cartography) को आकार दिया।

जब उनसे पूछा गया कि क्या इतिहास को दोबारा लिखना ‘आइडियोलॉजिकल हथियार’ बनाने जैसा नहीं है, तो डॉ. सम्पत ने स्पष्ट कहा कि इतिहास में भारत की उपलब्धियों को उजागर करना किसी तरह का हथियार नहीं है। उन्होंने बताया कि भारत ने गणित, योग, साहित्य, चिकित्सा और विज्ञान जैसे क्षेत्रों में बहुत योगदान दिया है, जिसे लंबे समय तक कम आंकल गया। सेनगुप्ता ने भी कहा कि यह इतिहास का पुनरुद्धार नकारने की बात नहीं है, बल्कि उसकी विस्तारशील व्याख्या होनी चाहिए — ताकि भारत पहले की तरह अपनी गहराई और विविधता को पहचान सके।

इस चर्चा का महत्त्व इसलिए और बढ़ जाता है क्योंकि यह महोत्सव सिर्फ साहित्य का मेला नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय आत्म-पहचान और ऐतिहासिक चेतना को मजबूत करने का एक मंच भी बन रहा है। ऐसे वक्ता और विचार, जो इतिहास को सिर्फ एक कॉलेज-पाठ्यक्रम के हिस्से न मानकर उसकी सांस्कृतिक और बौद्धिक पृष्ठभूमि की तरफ इशारा करते हैं, आज की युवा पीढ़ी के लिए बेहद ज़रूरी हो जाते हैं।

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