मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच अमेरिका द्वारा ईरान पर लगाए गए नौसैनिक घेराबंदी (Naval Blockade) ने वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था दोनों को हिला कर रख दिया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, इस ब्लॉकेड के कारण ईरान का तेल निर्यात लगभग ठप हो गया है, जिससे उसकी अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव बन गया है।
अमेरिकी नौसेना द्वारा ईरान के बंदरगाहों और तेल टैंकरों की निगरानी और रोकथाम के चलते ईरान के तेल निर्यात में भारी गिरावट आई है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि अप्रैल के मध्य तक ईरान के तेल निर्यात में 80% से अधिक की कमी आ गई, जिससे लाखों बैरल कच्चा तेल समुद्र में ही फंसा हुआ है।
इस घेराबंदी का सीधा असर ईरान की अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। तेल उसके कुल निर्यात का बड़ा हिस्सा है, और इस पर रोक लगने से उसकी मुद्रा कमजोर हो रही है, बेरोजगारी बढ़ रही है और महंगाई तेजी से ऊपर जा रही है।
चीन पर क्यों पड़ रहा है असर?
इस पूरे घटनाक्रम का असर केवल ईरान तक सीमित नहीं है। चीन, जो ईरान के तेल का सबसे बड़ा खरीदार रहा है, अब ऊर्जा आपूर्ति संकट का सामना कर सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी ब्लॉकेड ने चीन की “एनर्जी लाइफलाइन” को सीधे चुनौती दी है, क्योंकि चीनी जहाजों और तेल आपूर्ति मार्गों पर भी असर पड़ रहा है।
ईरान अब वैकल्पिक रास्तों—जैसे रेल और पड़ोसी देशों के जरिए तेल भेजने की कोशिश कर रहा है, लेकिन इससे केवल सीमित व्यापार ही संभव हो पा रहा है।
वैश्विक असर: तेल की कीमतों में उछाल
इस संकट का असर पूरी दुनिया पर पड़ रहा है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य, जहां से दुनिया का करीब 20% तेल गुजरता है, बाधित होने से वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित हुई है। इसके चलते तेल की कीमतों में भारी उछाल देखने को मिला है और कई देशों में ईंधन संकट की आशंका बढ़ गई है।
क्या बढ़ सकता है युद्ध का खतरा?
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह ब्लॉकेड लंबे समय तक जारी रहता है, तो ईरान की ओर से सैन्य प्रतिक्रिया की संभावना भी बढ़ सकती है। पहले ही ईरान इसे “आर्थिक युद्ध” मान रहा है और जवाबी कार्रवाई की चेतावनी दे चुका है।
