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अमेरिका-इजराइल के दबाव के आगे नहीं झुका ईरान

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मध्य पूर्व में जारी भीषण संघर्ष के बीच ईरान ने साफ संकेत दे दिया है कि वह अमेरिका और इजराइल के दबाव के आगे झुकने वाला नहीं है। ताजा घटनाक्रम में ईरान के शीर्ष नेतृत्व, खासकर नए सुप्रीम लीडर आयतुल्ला मोजतबा खामेनेई के रुख को इस जिद और कड़े प्रतिरोध की मुख्य वजह माना जा रहा है। विश्लेषकों के अनुसार, ईरान की रणनीति केवल सैन्य जवाब तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैचारिक और राजनीतिक स्तर पर भी अमेरिका-इजराइल गठबंधन को चुनौती देने की कोशिश है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान ने अमेरिका की ओर से पेश किए गए शांति प्रस्तावों को या तो खारिज कर दिया है या बेहद सख्त शर्तों के साथ ही बातचीत की बात कही है। ईरानी नेतृत्व का मानना है कि किसी भी वार्ता से पहले अमेरिका और इजराइल को “हार स्वीकार करनी होगी” और नुकसान की भरपाई करनी होगी। यही वजह है कि युद्धविराम की संभावनाएं फिलहाल कमजोर नजर आ रही हैं, जबकि जमीन पर संघर्ष लगातार तेज हो रहा है।

इस पूरे टकराव के पीछे “आयतुल्ला की रिंग” यानी सत्ता के अंदर मौजूद कट्टरपंथी समूह की भूमिका अहम मानी जा रही है। यह समूह इस विचारधारा पर काम करता है कि पश्चिमी ताकतों के सामने झुकना ईरान की संप्रभुता के खिलाफ है। हाल के दिनों में ईरान के अंदर भी कट्टरपंथी नेताओं की आवाज मजबूत हुई है, जो खुले तौर पर परमाणु हथियार बनाने तक की मांग कर रहे हैं।

इसी बीच अमेरिका और इजराइल की सैन्य कार्रवाई लगातार जारी है। दोनों देशों ने ईरान के कई सैन्य ठिकानों, मिसाइल बेस और रणनीतिक केंद्रों को निशाना बनाया है, जिससे ईरान की सैन्य क्षमता को नुकसान पहुंचा है। हालांकि इसके बावजूद ईरान पूरी तरह कमजोर नहीं हुआ है और वह लगातार मिसाइल और ड्रोन हमलों के जरिए जवाब दे रहा है।

हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि अमेरिका संभावित ग्राउंड ऑपरेशन की भी तैयारी कर रहा है, जबकि ईरान ने चेतावनी दी है कि अगर अमेरिकी सैनिक जमीन पर उतरे तो उन्हें “भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।” इस बयान से साफ है कि दोनों पक्ष पीछे हटने के मूड में नहीं हैं और युद्ध और भी व्यापक हो सकता है।

इस संघर्ष का असर सिर्फ सैन्य मोर्चे तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा आपूर्ति पर भी पड़ा है। होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे अहम समुद्री मार्ग पर तनाव के कारण तेल सप्लाई प्रभावित हुई है और वैश्विक बाजार में कीमतों में उछाल देखा जा रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान का यह कड़ा रुख केवल मौजूदा युद्ध तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आने वाले समय में वैश्विक शक्ति संतुलन को भी प्रभावित कर सकता है। अगर कूटनीतिक समाधान नहीं निकला, तो यह संघर्ष और लंबा खिंच सकता है और पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर सकता है।

कुल मिलाकर, अमेरिका और इजराइल के दबाव के बावजूद ईरान का झुकने से इनकार इस बात का संकेत है कि यह केवल सैन्य संघर्ष नहीं बल्कि विचारधारा और वर्चस्व की लड़ाई बन चुका है, जिसमें “आयतुल्ला की रणनीति” निर्णायक भूमिका निभा रही है।

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