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स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पर टिप्पणी के बाद ममता कुलकर्णी किन्नर अखाड़े से निष्कासित

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पूर्व बॉलीवुड अभिनेत्री ममता कुलकर्णी एक बार फिर सुर्खियों में हैं, लेकिन इस बार फिल्मी पर्दे से नहीं बल्कि आध्यात्मिक विवाद के बीच। प्रयागराज के माघ मेले में एक धार्मिक मुद्दे को लेकर उन्होंने शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती पर टिप्पणी की, जिसके बाद किन्नर अखाड़ा ने उन्हें संगठन से निष्कासित (expelled) कर दिया है। अखाड़े की यह कार्रवाई आज 27 जनवरी 2026 को सामने आई और इस खबर ने सामाजिक तथा धार्मिक जगत में हलचल मचा दी है।

ममता कुलकर्णी, जिन्होंने 1990 के दशक में कई हिट फिल्मों में काम किया और बाद में अपने जीवन को आध्यात्मिक साधना की ओर मोड़ा, को जनवरी 2025 के महाकुंभ मेले में किन्नर अखाड़ा ने ‘महामंडलेश्वर शिवा नाम श्रीयामाई ममतानंद गिरि’ के पद पर नियुक्त किया था। लेकिन कुछ दिनों पहले यहां के धार्मिक विवाद में उन्होंने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के बारे में विवादित बयान दिया, जिसमें उन्होंने कहा कि केवल साधारण वेश भेष धारण करना या पद पाना किसी को असली संत नहीं बनाता और उनमें अहंकार तथा “ज्ञान शून्य” जैसा गुण है।

किन्नर अखाड़े की ओर से कहा गया है कि उनकी मर्यादा और अनुशासन को बनाए रखने के लिए ऐसी विवादित टिप्पणी और व्यक्तिगत आलोचना को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता, खासकर जब अखाड़ा स्वयं विवादों से दूर रहना चाहता है। अखाड़ा प्रमुख आचार्य महामंडलेश्वर डॉ. लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी ने यह घोषणा करते हुए स्पष्ट किया कि ममता कुलकर्णी अब किन्नर अखाड़े की सदस्य नहीं हैं और उनका पद भी समाप्त कर दिया गया है।

यह विवाद उस धार्मिक घटनाक्रम से जुड़ा है जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने हाल ही में मौनी अमावस्या के अवसर पर संगम पर पालकी से स्नान करने की इच्‍छा जताई थी, लेकिन प्रशासन ने भारी भीड़ के कारण पुलिस उपायों के बीच उसे रोक दिया था, जिससे संतों के बीच असंतोष फैल गया था। इस पर अमावस्या से जुड़े धार्मिक मुद्दे की वजह से पहले ही हंगामा भी दर्ज किया गया था।

ममता कुलकर्णी की टिप्पणी और उसके बाद किन्नर अखाड़े द्वारा उठाया गया यह कदम दोनों ही धार्मिक समुदायों और साधु-संतों के बीच गरिमा, मर्यादा और अनुशासन जैसे विषयों पर तीखी बहस का कारण बन गया है। अखाड़े ने यह भी बताया कि संगठन को किसी भी विवाद में गिराए बिना शांतिपूर्ण और सामंजस्यपूर्ण गतिविधियों पर ध्यान केंद्रित करना है, इसीलिए यह सख्त निर्णय लिया गया।

इस मामले में ममता कुलकर्णी की आध्यात्मिक जीवन यात्रा और उसके बावजूद विवादों का केंद्र बनना दर्शाता है कि धार्मिक प्रतिष्ठानों में किसी भी प्रकार की असहमतिपूर्ण टिप्पणी संस्कार, अनुशासन और समुदाय की गरिमा के लिए कितनी संवेदनशील हो सकती है। उनके निष्कासन के बाद सामाजिक और धार्मिक संगठनों में भी इस निर्णय को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ सामने आ रही हैं।

यह घटना न सिर्फ किन्नर अखाड़े और ममता कुलकर्णी के बीच संबंधों को प्रभावित कर रही है, बल्कि धार्मिक नेतृत्व और अनुशासन के मुद्दों पर भी एक व्यापक सार्वजनिक संवाद को जन्म देती है कि धार्मिक संगठनों में व्यक्तिगत बयानों और समूह के निर्णयों के बीच संतुलन कैसे रखा जाना चाहिए।

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