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सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सोशल मीडिया और OTT प्लेटफॉर्म्स पर आपत्तिजनक (obscene / offensive) कंटेंट को नियंत्रित करने के लिए केंद्र सरकार को चार हफ्तों में जवाब देना होगा।
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कोर्ट ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि अश्लीलता किसी माध्यम — चाहे किताब हो, पेंटिंग हो, वीडियो हो — किसी भी रूप में हो सकती है, और यदि उसकी ‘नीलामी’ (public sale/distribution) होती है, तो उस पर पाबंदी होनी चाहिए।
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न्यायालय ने सुझाव दिया है कि एक विशेषज्ञों की समिति बने — जिसमें न्यायपालिका और मीडिया से लोग शामिल हों — ताकि सोशल मीडिया/OTT कंटेंट को व्यवस्थित (regulate) किया जा सके।
क्या है कारण और महत्व
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कोर्ट ने कहा कि बिना अनुमति या चेतावनी (disclaimer / warning) के आपत्तिजनक कंटेंट दिखाया जाना — “यूज़र की मर्जी के बिना” — चिंता की बात है।
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यह कदम डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की बेतहाशा आजादी और ‘self-regulation’ पर सवाल उठा रहा है, और चाहता है कि कंटेंट मॉनिटरिंग और जिम्मेदारी तय हो।
सम्भावित असर
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अगर सरकार व प्लेटफॉर्म्स कार्रवाई करती हैं — तो OTT / सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर अब जुर्माना या प्रतिबंध जैसे नियम आ सकते हैं।
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यूज़र्स, कंटेंट-क्रिएटर, और प्लेटफॉर्म्स दोनों के लिए यह तय करना मुश्किल हो जायेगा कि क्या दिखाना/देखना सुरक्षित है या नहीं — कंटेंट पर सेंसरशिप की बहस फिर से तेज होगी।
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पहली बार ऐसा संकेत है कि ऑनलाइन डिजिटल मीडिया पर जुर्माना-कायदा (regulatory oversight) स्थायी रूप में लागू हो सकता है — जिसकी प्रभावी पहुँच हर घर तक होगी।
