मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में 10 साल की बच्ची को उसके कनाडा में रहने वाले पिता के पास भेजने से इनकार कर दिया। इंदौर बेंच ने साफ कहा कि किसी भी विदेशी अदालत का आदेश अंतिम नहीं होता, और सबसे ऊपर बच्चे का “हित और कल्याण” होता है।
कोर्ट ने यह फैसला पिता द्वारा दायर हैबियस कॉर्पस याचिका को खारिज करते हुए दिया, जिसमें कनाडा की अदालत (ओंटारियो) के आदेश के आधार पर बच्ची की कस्टडी मां से लेकर पिता को देने की मांग की गई थी। हालांकि हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि विदेशी अदालत के आदेश केवल एक “प्रासंगिक कारक” हो सकते हैं, लेकिन वे बाध्यकारी नहीं हैं।
न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति बिनोद कुमार द्विवेदी की पीठ ने कहा कि बच्चे की भलाई, उसकी भावनात्मक स्थिति, शिक्षा और स्थिरता को प्राथमिकता देना जरूरी है। कोर्ट ने बच्ची से बातचीत के दौरान पाया कि वह अपनी मां के साथ सहज और भावनात्मक रूप से जुड़ी हुई है, और भारत में अच्छी तरह से सेटल है।
फैसले में अदालत ने यह भी कहा कि “कॉमिटी ऑफ कोर्ट्स” (अंतरराष्ट्रीय न्यायिक सम्मान) महत्वपूर्ण है, लेकिन यह बच्चे के हित से ऊपर नहीं हो सकता। यदि विदेशी आदेश बच्चे के हित के खिलाफ हो, तो भारतीय अदालत उसे लागू करने के लिए बाध्य नहीं है।
दिलचस्प रूप से कोर्ट ने अपने निर्णय में रामायण का भी उल्लेख किया और कहा कि जैसे माता सीता ने लव-कुश का पालन-पोषण किया, उसी तरह मां बच्चे का पहला घर और सबसे महत्वपूर्ण संरक्षक होती है। अदालत ने “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” का हवाला देते हुए मां के महत्व को रेखांकित किया।
यह फैसला एक बार फिर स्पष्ट करता है कि भारत में बाल संरक्षण मामलों में कानूनी अधिकारों से अधिक बच्चे का सर्वोत्तम हित सर्वोपरि माना जाता है।
