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नागपुर में माता-पिता ने 12 वर्षीय बेटे को अनुशासन सिखाने के नाम पर जंजीरों से बाँधा रखा

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नागपुर, 3 जनवरी 2026: महाराष्ट्र के नागपुर शहर से एक दिल दहला देने वाली और गंभीर बाल शोषण (Child Abuse) की घटना सामने आई है, जिसमें माता-पिता ने अपने 12 वर्षीय बेटे को लोहे की जंजीरों और ताले से बाँधकर घर में कैद रखा। यह यह चौंकाने वाला मामला बाल अधिकारों की संवेदनशीलता और पारिवारिक अनुशासन के नाम पर उठाए जा रहे अमानवीय कदमों पर सवाल खड़ा करता है।

क्या हुआ मामला?

घटना दक्षिण नागपुर के एक घर में हुई, जहाँ दोनों मज़दूर माता-पिता अपने रोज़ काम पर जाने से पहले बेटे को बेड़ियों और पेडलॉक से बाँध देते थे। पुलिस और बाल संरक्षण टीम को सूचना दी गई तो घर पर जांच करने पर देखा गया कि बच्चे के हाथ-पैर में चोट के निशान मौजूद थे और वह भयभीत अवस्था में जंजीरों से जकड़ा हुआ मिला। आम लोगों और पड़ोसियों ने इस अपमानजनक और अमानवीय हरकत की शिकायत पुलिस और बाल हेल्पलाइन (1098) से की थी।

माता-पिता का दावा और वजह

माता-पिता का दावा है कि उनके बेटे का व्यवहार बिगड़ा हुआ था, वह बार-बार घर से भागता था, उन्होंने कहा कि वह न तो उनकी बात सुनता था और न ही सुधार दिखाता था। वे यह मानते थे कि जंजीरों में बाँधकर रखना ही उसका व्यवहार ठीक करने का एकमात्र तरीका है। उन्होंने यह भी बताया कि बेटे ने कुछ बार मोबाइल फोन चुराया था, जिसकी वजह से उनका गुस्सा और चिंता बढ़ी थी। लेकिन इस तरह का कदम उठाना कानून और नैतिकता के दायरे से बिल्कुल बाहर है।

पुलिस और बचाव दल की कार्रवाई

स्थानीय डिस्ट्रिक्ट महिला एवं बाल विकास विभाग और बाल संरक्षण कक्ष (Child Protection Unit) की टीम ने जब जानकारी पाई, तो तुरंत घर में छापा मारा और बच्चे को मुक्त कराया। बालक को भयभीत अवस्था में पाकर सुरक्षित स्थान पर ले जाया गया और बाल कल्याण समिति (Child Welfare Committee – CWC) के पास पेश किया गया। अधिकारीयों ने बताया कि उसकी देखभाल और परामर्श (Counselling) की व्यवस्था की जा रही है।

कानूनी कार्रवाई

जाँच के दौरान तुरंत अजनी पुलिस थाने में माता-पिता के खिलाफ “Juvenile Justice Act” के तहत मामला दर्ज किया गया है। दोनों पर यह आरोप है कि उन्होंने अपने बच्चे के मानवाधिकारों का उल्लंघन किया और उसे मानसिक तथा शारीरिक रूप से पीड़ा पहुँचाई। अब इस मामले की गंभीरता से जांच चल रही है ताकि तय किया जा सके कि आगे क्या आपराधिक प्रतिबद्धता होनी चाहिए और बालक की सुरक्षा के लिए क्या कदम उठाए जाएं।

समाज और बाल अधिकारों पर प्रभाव

विशेषज्ञ और बाल अधिकार कार्यकर्ता इस घटना को न केवल एक पारिवारिक समस्या बल्कि एक सामाजिक चेतावनी संकेत के रूप में देख रहे हैं। उनका कहना है कि बच्चों को अनुशासन सिखाने का तरीका कभी भी हिंसा या जंजीरों का सहारा नहीं हो सकता। इस प्रकार के व्यवहार से बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ते हैं और यह कानूनी दृष्टि से भी अपराध है

विशेष रूप से यह मामला यह भी उजागर करता है कि समुदाय, पड़ोसी और बाल हेल्पलाइन जैसी संस्थाएँ कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं जब पारिवारिक समस्या अमानवीय सीमा तक पहुँच जाती है। पड़ोसियों और नागरिकों ने समय रहते सूचना देकर बच्चे को सुरक्षित निकालवाया, जिससे एक और बड़ी त्रासदी टल गई।

यह मामला महाराष्ट्र के नागपुर शहर में बाल अधिकार सुरक्षा और कानूनी नियमों की अनुपालना की महत्ता को एक बार फिर सामने लाता है। माता-पिता द्वारा अनुशासन सिखाने के नाम पर इस तरह का कदम उठाना न केवल कानून के विरुद्ध है बल्कि यह मानवीय मूल्यों के भी खिलाफ है। न्यायालय द्वारा मामले की न्यायिक प्रक्रिया के तहत आगे क्या कदम उठाए जाते हैं, यह अब समाज की निगाहों के साथ देखा जा रहा है।

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