देश में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानी NCRB की 2024 रिपोर्ट ने महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों की बेहद चिंताजनक तस्वीर पेश की है। रिपोर्ट के मुताबिक देशभर में महिलाओं के खिलाफ हिंसा, दुष्कर्म, अपहरण और घरेलू प्रताड़ना के हजारों मामले दर्ज किए गए हैं। आंकड़े बताते हैं कि कानून सख्त होने और लगातार जागरूकता अभियानों के बावजूद महिलाओं के खिलाफ अपराध अब भी बड़ी सामाजिक चुनौती बने हुए हैं।
रिपोर्ट के अनुसार साल 2024 में देशभर में महिलाओं के खिलाफ अपराध के कुल 4.41 लाख से ज्यादा मामले दर्ज हुए। इनमें सबसे ज्यादा मामले घरेलू हिंसा और पति या रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता से जुड़े रहे। NCRB के आंकड़ों के मुताबिक 1.2 लाख से अधिक महिलाओं ने पति और ससुराल पक्ष द्वारा प्रताड़ना की शिकायत दर्ज कराई। यह आंकड़ा दिखाता है कि महिलाओं के लिए सबसे असुरक्षित जगह कई बार उनका अपना घर ही बन जाता है।
रिपोर्ट में दुष्कर्म और महिलाओं के अपहरण के मामलों ने भी चिंता बढ़ाई है। आंकड़ों के अनुसार 15 हजार से ज्यादा रेप के मामले और करीब 10 हजार अपहरण के केस दर्ज किए गए। विशेषज्ञों का मानना है कि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है क्योंकि देश में आज भी बड़ी संख्या में महिलाएं सामाजिक दबाव, डर और बदनामी की वजह से शिकायत दर्ज नहीं करातीं। NCRB के आंकड़े यह भी बताते हैं कि अधिकांश मामलों में आरोपी पीड़िता का परिचित, रिश्तेदार या करीबी व्यक्ति होता है।
कई मामलों में पड़ोसी, दोस्त, रिश्तेदार और यहां तक कि परिवार के सदस्य भी अपराध में शामिल पाए गए। इससे महिलाओं की सुरक्षा को लेकर समाज में भरोसे का संकट और गहरा होता दिखाई दे रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों की जड़ें केवल कानून व्यवस्था की कमजोरी में नहीं बल्कि सामाजिक सोच और पितृसत्तात्मक मानसिकता में भी छिपी हैं। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में महिलाओं को लेकर भेदभाव, दबाव और हिंसा की घटनाएं लगातार सामने आती रहती हैं।
घरेलू हिंसा, दहेज उत्पीड़न, ऑनर किलिंग और यौन हिंसा जैसी घटनाएं आज भी समाज में मौजूद गहरी असमानता को दिखाती हैं। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि कई राज्यों में महिलाओं के खिलाफ अपराधों की दर राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक रही। बड़े शहरों में भी महिलाओं की सुरक्षा गंभीर मुद्दा बनी हुई है। दिल्ली, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में अपराधों के आंकड़े लगातार चर्चा का विषय बने हुए हैं।
हालांकि कुछ राज्यों में मामलों में मामूली गिरावट भी दर्ज की गई है। महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि सिर्फ कानून बनाने से समस्या खत्म नहीं होगी। जरूरी है कि पुलिस व्यवस्था को अधिक संवेदनशील बनाया जाए, फास्ट ट्रैक कोर्ट मजबूत हों और पीड़ित महिलाओं को मानसिक तथा कानूनी सहायता आसानी से मिले। कई सामाजिक संगठनों ने यह भी मांग की है कि स्कूल स्तर से ही लैंगिक समानता और महिलाओं के सम्मान को लेकर शिक्षा दी जाए।
रिपोर्ट में बच्चों के खिलाफ अपराधों में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। NCRB के अनुसार 2024 में बच्चों के खिलाफ अपराधों में लगभग 6 प्रतिशत की वृद्धि हुई। विशेषज्ञों का कहना है कि महिलाओं और बच्चों के खिलाफ बढ़ती हिंसा समाज के लिए गंभीर चेतावनी है और इसे केवल अपराध के रूप में नहीं बल्कि सामाजिक संकट के रूप में देखने की जरूरत है। सरकार की ओर से लगातार महिला सुरक्षा के लिए कई योजनाएं और अभियान चलाए जा रहे हैं।
महिला हेल्पलाइन, फास्ट ट्रैक कोर्ट, वन स्टॉप सेंटर और डिजिटल शिकायत व्यवस्था जैसी सुविधाएं बढ़ाई गई हैं। लेकिन इसके बावजूद लगातार सामने आ रहे आंकड़े यह दिखाते हैं कि जमीनी स्तर पर अभी भी काफी काम किया जाना बाकी है। NCRB की यह रिपोर्ट केवल आंकड़ों का दस्तावेज नहीं बल्कि समाज के सामने एक बड़ा सवाल भी है कि आखिर महिलाएं कब तक डर और असुरक्षा के माहौल में जीती रहेंगी। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक समाज की सोच नहीं बदलेगी और अपराधियों में कानून का डर पैदा नहीं होगा, तब तक महिलाओं के खिलाफ हिंसा को पूरी तरह रोक पाना मुश्किल रहेगा।
