नेपाल-चीन सीमा पर 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ ने पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। ग्लेशियर और बर्फ के अचानक टूटने से पैदा हुई बाढ़ ने नेपाल के रासुवा क्षेत्र और चीन के तिब्बत इलाके में भारी तबाही मचाई। इस घटना ने भारत के लिए भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, क्योंकि हिमालय के कई ग्लेशियर और ग्लेशियल झीलें ऐसी स्थिति पैदा कर सकती हैं, जिसका असर सीमाओं से बहुत दूर तक पहुंच सकता है।
इस तरह की आपदा को Glacial Lake Outburst Flood यानी GLOF कहा जाता है। जब ग्लेशियर तेजी से पिघलते हैं तो उनके आसपास पानी से भरी झीलें बनती या बड़ी होती जाती हैं। इन झीलों को रोकने वाली प्राकृतिक बर्फ या मोरेन की दीवार कमजोर पड़ जाए और अचानक टूट जाए, तो बेहद तेज गति से पानी, बर्फ, पत्थर और मलबे की लहर नीचे की ओर आती है। कुछ ही समय में यह बाढ़ पुल, सड़क, गांव और हाइड्रोपावर परियोजनाओं को तबाह कर सकती है।
नेपाल की हालिया त्रासदी ने भारत के हिमालयी राज्यों की चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों और संयुक्त राष्ट्र से जुड़े अधिकारियों ने चेताया है कि बढ़ते तापमान और ग्लेशियरों के पीछे हटने के कारण हिमालय में ग्लेशियल झीलों से जुड़े जोखिम बढ़ रहे हैं। एक आकलन के मुताबिक हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में 407 ग्लेशियल झीलें ऐसी हैं, जिनके फटने का खतरा मौजूद है।
भारत के लिए सिक्किम सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में से एक है। 2023 में South Lhonak Lake के फटने से सिक्किम में भीषण बाढ़ आई थी। इस आपदा में तीस्ता नदी का जलस्तर तेजी से बढ़ा और कई पुलों तथा बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान हुआ था। नेपाल की नई घटना ने इस पुराने खतरे को फिर सामने ला दिया है। अब सिक्किम में कई संवेदनशील ग्लेशियल झीलों की निगरानी और शुरुआती चेतावनी व्यवस्था को और मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है।
हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और लद्दाख भी इस बड़े हिमालयी जोखिम से पूरी तरह अलग नहीं हैं। इन क्षेत्रों में ग्लेशियरों के आसपास बदलती परिस्थितियां, भूस्खलन, अचानक बाढ़ और हाइड्रोपावर परियोजनाओं की मौजूदगी खतरे को और गंभीर बना सकती है। अगर किसी ऊंचाई वाले इलाके में अचानक ग्लेशियल झील टूटती है, तो नीचे बसे इलाकों तक पानी और मलबा पहुंचने में बहुत कम समय लग सकता है।
नेपाल की घटना से सबसे बड़ा सबक Early Warning System को लेकर सामने आया है। विशेषज्ञों का मानना है कि संवेदनशील झीलों में पानी के स्तर, तापमान और झील की दीवारों की स्थिति पर लगातार नजर रखने वाले सेंसर लगाए जाने चाहिए। खतरा बढ़ने पर सायरन और मोबाइल अलर्ट के जरिए नीचे रहने वाली आबादी को तुरंत सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा सकता है। हालिया आपदा ने यह भी दिखाया है कि केवल आपदा आने के बाद राहत अभियान चलाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि पहले से चेतावनी और निकासी की व्यवस्था बेहद जरूरी है।
इस खतरे का एक और महत्वपूर्ण पहलू सीमा पार सहयोग है। हिमालय की नदियां और ग्लेशियर किसी अंतरराष्ट्रीय सीमा को नहीं मानते। तिब्बत से निकलने वाली कई नदियां भारत और नेपाल की ओर बहती हैं। इसलिए ऊपरी क्षेत्र में ग्लेशियर या झील में होने वाला बड़ा बदलाव नीचे के देशों के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। भारत के लिए ब्रह्मपुत्र, सतलुज और सिंधु जैसी नदी प्रणालियों से जुड़े जल संबंधी आंकड़ों का महत्व इसी वजह से बहुत ज्यादा है।
नेपाल-चीन सीमा की हालिया तबाही ने यह सवाल भी खड़ा किया है कि आपदा के समय रियल-टाइम जानकारी कितनी तेजी से साझा की जाती है। सीमावर्ती इलाकों में अगर किसी ग्लेशियल झील के टूटने या अचानक जलस्तर बढ़ने की सूचना समय पर नीचे के देशों तक पहुंच जाए, तो हजारों लोगों को सुरक्षित स्थानों पर ले जाने का मौका मिल सकता है। इसलिए वैज्ञानिक निगरानी के साथ भारत, नेपाल और चीन के बीच बेहतर हाइड्रोलॉजिकल डेटा शेयरिंग और आपदा चेतावनी तंत्र की जरूरत और बढ़ गई है।
हालिया नेपाल आपदा का पैमाना बेहद भयावह रहा है। 7 सितंबर तक उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार नेपाल और तिब्बत में मृतकों की संख्या 1,380 से अधिक हो चुकी थी और 5,500 से ज्यादा लोग लापता बताए गए थे। नेपाल में रेस्क्यू टीमें अब भी हाइड्रोपावर परियोजनाओं की सुरंगों में फंसे लोगों की तलाश कर रही हैं। यह स्थिति बताती है कि हिमालयी आपदाएं केवल गांवों और सड़कों तक सीमित खतरा नहीं हैं, बल्कि बड़ी औद्योगिक और ऊर्जा परियोजनाओं को भी प्रभावित कर सकती हैं।
भारत के लिए संदेश साफ है—हिमालय को सिर्फ प्राकृतिक सुंदरता और जल संसाधन के तौर पर देखने के बजाय इसे एक बेहद संवेदनशील आपदा क्षेत्र के रूप में भी समझना होगा। ग्लेशियल झीलों की मैपिंग, रियल-टाइम सेंसर, सैटेलाइट निगरानी, सायरन सिस्टम, सुरक्षित निकासी मार्ग और स्थानीय लोगों की ट्रेनिंग अब आपदा प्रबंधन की प्राथमिकता होनी चाहिए। नेपाल की त्रासदी अगर भारत के लिए समय रहते चेतावनी बनती है, तो भविष्य में होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
