पाकिस्तान की राजनीति में सेना की भूमिका को लेकर एक बार फिर तीखी बहस छिड़ गई है। जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम (फ) के प्रमुख मौलाना फजलुर रहमान ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर पर सीधा हमला बोलते हुए कहा कि यदि सेना को राजनीति करनी है तो उसे वर्दी छोड़कर लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत चुनाव लड़ना चाहिए। पंजाब प्रांत के कसूर में आयोजित एक जनसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि सेना का दायित्व देश की सुरक्षा करना है, जबकि सरकार चलाने और राजनीतिक फैसले लेने का अधिकार जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों का है। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब पाकिस्तान में सुरक्षा चुनौतियों और राजनीतिक अस्थिरता को लेकर लगातार बहस जारी है।
अपने भाषण में मौलाना फजलुर रहमान ने आरोप लगाया कि पाकिस्तान में सेना संवैधानिक सीमाओं से आगे बढ़कर राजनीतिक मामलों में हस्तक्षेप करती रही है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में जनता जिसे चाहे सत्ता सौंप सकती है और इस अधिकार में किसी अन्य संस्था को दखल नहीं देना चाहिए। उन्होंने चुनौतीपूर्ण अंदाज में कहा कि यदि सेना वास्तव में जनता का समर्थन देखना चाहती है तो उसे राजनीतिक दल की तरह चुनावी मैदान में उतरना चाहिए। उनके इस बयान को पाकिस्तान की सैन्य और राजनीतिक व्यवस्था पर सबसे तीखे सार्वजनिक हमलों में से एक माना जा रहा है।
मौलाना ने बलूचिस्तान की बिगड़ती सुरक्षा स्थिति पर भी गंभीर चिंता जताई। उन्होंने दावा किया कि प्रदेश के कई इलाकों में सरकार और सुरक्षा एजेंसियों का प्रभाव कमजोर पड़ गया है और हिंसा का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है। उनके अनुसार, हालात केवल बलूचिस्तान तक सीमित नहीं हैं बल्कि खैबर पख्तूनख्वा जैसे क्षेत्रों में भी अस्थिरता बढ़ रही है। हालांकि, उनके इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। हाल के दिनों में बलूचिस्तान में सुरक्षा बलों और प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) के बीच कई हिंसक घटनाएं हुई हैं, जिनमें बड़ी संख्या में लोगों की जान गई है।
उन्होंने हाल ही में सेना प्रमुख आसिम मुनीर द्वारा नागरिकों से आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में सहयोग की अपील पर भी सवाल उठाए। मौलाना ने कहा कि देश की रक्षा करना और आतंकवाद से मुकाबला करना सेना और राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी है। आम नागरिकों से हथियारबंद समूहों के खिलाफ लड़ने की अपेक्षा करना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि जनता अपने करों के माध्यम से सेना और सरकारी संस्थाओं का खर्च उठाती है, इसलिए सुरक्षा सुनिश्चित करना भी उन्हीं संस्थाओं की जिम्मेदारी है।
पाकिस्तान में पिछले कुछ समय से बलूचिस्तान में बढ़ती हिंसा और अलगाववादी गतिविधियां सरकार के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई हैं। हाल में हुए कई बड़े हमलों के बाद प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सुरक्षा बलों के साथ उच्चस्तरीय बैठक कर आतंकवाद के खिलाफ अभियान और तेज करने की बात कही थी। सरकार का कहना है कि उग्रवादी संगठनों के खिलाफ अभियान जारी रहेगा और देश में कानून-व्यवस्था बहाल करने के लिए हरसंभव कदम उठाए जाएंगे।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मौलाना फजलुर रहमान का यह बयान केवल सेना प्रमुख की आलोचना तक सीमित नहीं है, बल्कि पाकिस्तान में नागरिक सरकार और सैन्य प्रतिष्ठान के बीच लंबे समय से चले आ रहे शक्ति संतुलन के विवाद को भी सामने लाता है। पाकिस्तान के इतिहास में कई बार सेना की राजनीतिक भूमिका को लेकर सवाल उठते रहे हैं और विभिन्न राजनीतिक दल समय-समय पर इस मुद्दे को उठाते रहे हैं। ऐसे में मौलाना का यह बयान आने वाले दिनों में पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति में नई बहस और टकराव को जन्म दे सकता है। फिलहाल सेना की ओर से इस बयान पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
