इस्लामाबाद/मुजफ्फराबाद। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में हालात लगातार तनावपूर्ण होते जा रहे हैं। बीते कुछ दिनों से जारी विरोध प्रदर्शनों और सुरक्षा बलों के साथ हुई हिंसक झड़पों के बाद पाकिस्तान प्रशासन ने आंदोलनकारी संगठन जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) के खिलाफ बड़ा अभियान शुरू कर दिया है। चार प्रमुख नेताओं की गिरफ्तारी के लिए वारंट जारी किए गए हैं और उनकी सूचना देने वालों के लिए एक करोड़ पाकिस्तानी रुपये के इनाम की घोषणा की गई है। इस घटनाक्रम ने पूरे क्षेत्र में राजनीतिक उथल-पुथल पैदा कर दी है और मानवाधिकार संगठनों की चिंताएं भी बढ़ा दी हैं।
पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की तथाकथित सरकार द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार शौकत नवाज मीर, उमर नजीर कश्मीरी, ख्वाजा मेहरान अर्शद और सरदार अमन खान की गिरफ्तारी के लिए विशेष अभियान चलाया जा रहा है। प्रशासन का आरोप है कि ये नेता हाल के विरोध प्रदर्शनों और अशांति फैलाने में शामिल रहे हैं। दूसरी ओर JAAC का कहना है कि वह जनता के लोकतांत्रिक और आर्थिक अधिकारों की लड़ाई लड़ रहा है और उसे जानबूझकर दबाने की कोशिश की जा रही है।
दरअसल पूरा विवाद आगामी 27 जुलाई को होने वाले विधानसभा चुनावों से जुड़ा हुआ है। प्रदर्शनकारी उन 12 आरक्षित सीटों का विरोध कर रहे हैं जो शरणार्थियों के लिए निर्धारित की गई हैं। JAAC और उसके समर्थकों का आरोप है कि इन सीटों पर ऐसे उम्मीदवार चुनाव लड़ते हैं जो वास्तव में क्षेत्र में निवास नहीं करते। आंदोलनकारियों का कहना है कि इससे स्थानीय जनता के राजनीतिक अधिकार कमजोर हो रहे हैं।
हालात तब और बिगड़ गए जब रावलाकोट और अन्य क्षेत्रों में प्रदर्शनकारियों तथा सुरक्षा बलों के बीच हिंसक झड़पें हुईं। विभिन्न रिपोर्टों में कई लोगों की मौत और सैकड़ों लोगों के घायल होने की बात कही गई है। हालांकि मृतकों की संख्या को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए हैं, लेकिन यह स्पष्ट है कि हिंसा ने पूरे क्षेत्र को हिला कर रख दिया है। कई स्थानों पर कर्फ्यू जैसे हालात बन गए और सुरक्षा बलों की भारी तैनाती करनी पड़ी।
पाकिस्तान प्रशासन ने हाल ही में JAAC को प्रतिबंधित संगठन घोषित कर दिया था। सरकार का तर्क है कि यह संगठन सार्वजनिक व्यवस्था और सुरक्षा के लिए खतरा बन गया है। वहीं JAAC नेताओं का कहना है कि उन्हें “आतंकवादी” घोषित करना राजनीतिक दमन का हिस्सा है और उनकी आवाज को दबाने का प्रयास किया जा रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच मानवाधिकार संगठनों ने भी चिंता जताई है। पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग (HRCP) और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार समूहों ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बल प्रयोग, इंटरनेट बंदी, बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियों और संचार प्रतिबंधों पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि जनता को शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार है और सरकार को संवाद के माध्यम से समाधान निकालना चाहिए।
भारत ने भी इस मामले पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। विदेश मंत्रालय ने पाकिस्तान पर गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगाते हुए कहा कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ अत्यधिक बल प्रयोग की खबरें चिंताजनक हैं। भारत ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से पाकिस्तान को उसके कथित कृत्यों और मानवाधिकार हनन के लिए जवाबदेह ठहराने की मांग की है।
विश्लेषकों का मानना है कि PoK में यह आंदोलन केवल चुनावी सीटों के मुद्दे तक सीमित नहीं है। प्रदर्शनकारियों ने महंगाई, बेरोजगारी, बिजली संकट, संसाधनों के कथित दोहन, इंटरनेट बंदी और राजनीतिक उपेक्षा जैसे कई मुद्दों को भी उठाया है। पिछले दो वर्षों में भी JAAC के नेतृत्व में आटा और बिजली की कीमतों को लेकर बड़े आंदोलन हुए थे, जिनमें कई बार सुरक्षा बलों के साथ टकराव देखने को मिला था।
मुजफ्फराबाद, मीरपुर, रावलाकोट और अन्य शहरों में आम हड़ताल का व्यापक असर देखने को मिला। बाजार बंद रहे, सड़कों पर सन्नाटा पसरा रहा और सार्वजनिक जीवन काफी हद तक प्रभावित हुआ। स्थानीय लोगों का कहना है कि क्षेत्र में तनाव लगातार बढ़ रहा है और सरकार को दमन की बजाय बातचीत का रास्ता अपनाना चाहिए।
फिलहाल PoK में स्थिति बेहद संवेदनशील बनी हुई है। एक तरफ प्रशासन JAAC नेतृत्व के खिलाफ सख्त कार्रवाई कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ जनता के एक बड़े वर्ग में असंतोष बढ़ता दिखाई दे रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पाकिस्तान सरकार संवाद का रास्ता चुनती है या फिर सुरक्षा कार्रवाई को और तेज करती है। लेकिन इतना तय है कि PoK में उभरा यह संकट अब केवल स्थानीय मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा का विषय बन चुका है।
