राजस्थान के नगरीय निकाय चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने राज्य के आदिवासी बहुल इलाकों में भी अपनी पकड़ मजबूत की है। खास तौर पर बांसवाड़ा, डूंगरपुर और प्रतापगढ़ जैसे आदिवासी बहुल जिलों में भाजपा के प्रदर्शन ने राजनीतिक चर्चा बढ़ा दी है। इन तीन जिलों की 9 शहरी निकायों में से 7 में भाजपा ने बोर्ड बनाने में सफलता हासिल की, जबकि कांग्रेस को 2 निकायों में बोर्ड मिला। भारत आदिवासी पार्टी (BAP) किसी भी निकाय में बोर्ड बनाने में सफल नहीं रही।
बांसवाड़ा, डूंगरपुर और प्रतापगढ़ को राजस्थान की आदिवासी राजनीति का महत्वपूर्ण क्षेत्र माना जाता है। यहां भारतीय आदिवासी पार्टी लंबे समय से आदिवासी पहचान और अलग ‘भील प्रदेश’ की मांग जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाती रही है। विधानसभा और लोकसभा चुनावों में भी BAP ने इस क्षेत्र में अपनी राजनीतिक मौजूदगी मजबूत की थी। ऐसे में नगर निकाय चुनावों में पार्टी का किसी भी निकाय में बोर्ड नहीं बना पाना उसके लिए एक महत्वपूर्ण चुनावी नतीजे के तौर पर देखा जा रहा है।
चुनावी आंकड़ों के मुताबिक, बांसवाड़ा की तीन शहरी निकायों में भाजपा ने दो पर बोर्ड बनाया, जबकि एक पर कांग्रेस को सफलता मिली। डूंगरपुर की दोनों शहरी निकायों में भाजपा का बोर्ड बना। वहीं प्रतापगढ़ की चार निकायों में से तीन पर भाजपा और एक पर कांग्रेस ने बोर्ड बनाया। इस तरह आदिवासी बहुल इन तीन जिलों की कुल 9 निकायों में भाजपा को 7 और कांग्रेस को 2 बोर्ड मिले।
राज्य के व्यापक चुनावी नतीजों में भी भाजपा को बढ़त मिली है। उपलब्ध चुनावी आंकड़ों के मुताबिक, राजस्थान की 309 शहरी निकायों में भाजपा ने 199 निकायों में बोर्ड बनाने में सफलता हासिल की, जबकि कांग्रेस 96 निकायों तक रही। 10 नगर निगमों में भी भाजपा ने अधिकांश जगहों पर बढ़त बनाई और 9 निगमों में बोर्ड बनने की स्थिति सामने आई।
BAP के लिए यह परिणाम इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि पिछले विधानसभा और लोकसभा चुनावों में पार्टी ने आदिवासी क्षेत्र में अपनी स्थिति मजबूत की थी। 2024 के लोकसभा चुनाव में BAP के राजकुमार रोत ने जीत दर्ज की थी और विधानसभा चुनाव में पार्टी के चार विधायक चुने गए थे। इन चुनावों के बाद BAP को राजस्थान की प्रमुख क्षेत्रीय राजनीतिक ताकतों में गिना जाने लगा था। नगर निकाय चुनाव में उसका कोई बोर्ड नहीं बनना अब पार्टी के संगठन और शहरी स्तर पर उसकी चुनावी रणनीति को लेकर चर्चा का विषय है।
भाजपा ने इस चुनाव के दौरान आदिवासी इलाकों में संगठनात्मक गतिविधियों पर भी जोर दिया। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने चुनाव से पहले आदिवासी अंचल के कई क्षेत्रों का दौरा किया और स्थानीय लोगों तथा नेताओं से संवाद किया। भाजपा की ओर से चुनावी तैयारी और स्थानीय स्तर पर संगठन को सक्रिय करने पर भी जोर दिया गया। हालांकि, किसी एक कारण को चुनावी नतीजों का निर्णायक कारण बताना आसान नहीं है और अलग-अलग राजनीतिक विश्लेषणों में अलग वजहें सामने रखी जा रही हैं।
इन नतीजों के बाद भाजपा ने अब आगामी पंचायत चुनावों पर भी ध्यान केंद्रित करना शुरू कर दिया है। पार्टी संगठन की ओर से पंचायत चुनावों के लिए कार्ययोजना पर चर्चा की जा रही है। भाजपा की राज्य इकाई ने निकाय चुनाव के बाद संगठन की समीक्षा भी शुरू की है, जिसमें टिकट वितरण, स्थानीय नेताओं की भूमिका और चुनाव के दौरान सामने आई संगठनात्मक कमियों पर रिपोर्ट तैयार करने की बात सामने आई है।
दूसरी ओर, पंचायत चुनाव ग्रामीण राजस्थान की राजनीति के लिए अलग तरह की चुनौती पेश करेंगे। नगरीय निकाय चुनावों के मुकाबले पंचायत स्तर पर स्थानीय समीकरण, उम्मीदवारों की व्यक्तिगत पकड़ और गांव-कस्बों के सामाजिक समीकरण ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। ऐसे में निकाय चुनाव में मिले परिणामों को सीधे पंचायत चुनावों का परिणाम मानना उचित नहीं होगा।
फिलहाल राजस्थान के आदिवासी बेल्ट में भाजपा के प्रदर्शन ने BAP और कांग्रेस दोनों के लिए नई राजनीतिक परिस्थितियां पैदा की हैं। BAP के सामने अब अपने संगठन को पंचायत स्तर तक मजबूत करने और आदिवासी क्षेत्र में अपनी राजनीतिक पकड़ को बनाए रखने की चुनौती होगी, जबकि भाजपा निकाय चुनाव के प्रदर्शन को पंचायत स्तर तक ले जाने की तैयारी में जुटी है। आने वाले पंचायत चुनावों में इन तीनों दलों की रणनीति और स्थानीय गठजोड़ पर खास नजर रहेगी।
