बॉलीवुड अभिनेता Rajpal Yadav को चेक बाउंस मामले में बड़ा कानूनी झटका लगा है। दिल्ली हाईकोर्ट ने उनके खिलाफ निचली अदालत द्वारा सुनाई गई दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए राहत देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने माना कि लंबे समय से चल रहे इस वित्तीय विवाद में अभिनेता अपनी कानूनी और आर्थिक जिम्मेदारियों का संतोषजनक ढंग से पालन नहीं कर सके। इसके साथ ही अदालत ने उन्हें फिर से जेल भेजने का आदेश दिया है। हालांकि पहले की तुलना में सजा की अवधि घटाकर 3 महीने कर दी गई है, लेकिन दोषसिद्धि को पूरी तरह बरकरार रखा गया है।
यह मामला कई चेक बाउंस शिकायतों से जुड़ा है, जिनका संबंध वर्षों पहले लिए गए वित्तीय लेन-देन और फिल्म निर्माण के लिए प्राप्त ऋण से बताया जाता है। शिकायतकर्ताओं का आरोप था कि अभिनेता द्वारा जारी किए गए कई चेक बैंक में प्रस्तुत किए जाने पर अनादृत हो गए थे। इसके बाद उनके खिलाफ परक्राम्य लिखत अधिनियम (Negotiable Instruments Act) के तहत कानूनी कार्रवाई शुरू हुई। मामले की सुनवाई कई वर्षों तक अलग-अलग स्तरों पर चलती रही और अंततः हाईकोर्ट ने भी निचली अदालत के फैसले को सही माना।
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि विवाद को सुलझाने के लिए अभिनेता को कई अवसर दिए गए, लेकिन तय समय के भीतर सभी प्रतिबद्धताओं का पालन नहीं किया गया। अदालत ने इस पहलू को गंभीर मानते हुए परिवीक्षा (प्रोबेशन) का लाभ देने से भी इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में वित्तीय अनुशासन और कानूनी दायित्वों का पालन आवश्यक है तथा बार-बार अवसर मिलने के बावजूद शर्तों का पालन न होने पर कानून के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।
बताया जा रहा है कि इस मामले में करोड़ों रुपये के वित्तीय विवाद का मुद्दा शामिल है। सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि अभिनेता की ओर से कुछ राशि का भुगतान किया जा चुका है, जिसे अदालत ने समायोजित करने का निर्देश दिया है। इसके बावजूद शेष दायित्व और कानूनी प्रक्रिया को देखते हुए अदालत ने दोषसिद्धि को रद्द करने से इनकार कर दिया। साथ ही शिकायतकर्ता को निर्धारित राशि का भुगतान करने संबंधी निर्देश भी दिए गए हैं।
राजपाल यादव हिंदी सिनेमा के लोकप्रिय हास्य कलाकारों में गिने जाते हैं और उन्होंने अपने लंबे फिल्मी करियर में अनेक सफल फिल्मों में यादगार भूमिकाएं निभाई हैं। ऐसे समय में आया यह फैसला उनके करियर और सार्वजनिक छवि के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि चेक बाउंस जैसे मामलों में अदालतें वित्तीय अनुशासन को लेकर लगातार सख्त रुख अपना रही हैं और यह फैसला भी उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है।
