यूरोप में जारी भीषण संघर्ष के बीच रूस और यूक्रेन के प्रतिनिधिमंडल स्विट्जरलैंड के शहर जिनेवा में शांति वार्ता के लिए आमने-सामने आए, लेकिन कई घंटों की बातचीत के बाद भी कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आ सका। अंतरराष्ट्रीय समुदाय की निगाहें इस बैठक पर टिकी थीं, क्योंकि यह प्रयास लंबे समय से जारी युद्ध को समाप्त करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा था। हालांकि वार्ता के बाद दोनों पक्षों के बयान यह संकेत देते हैं कि मतभेद अब भी गहरे हैं और समाधान की राह आसान नहीं दिख रही।
यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने वार्ता के बाद कहा कि शांति की इच्छा यूक्रेन की प्राथमिकता है, लेकिन देश की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता से कोई समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि पूर्वी क्षेत्रों, विशेषकर डोनबास को लेकर किसी भी प्रकार की रियायत यूक्रेनी जनता के लिए अस्वीकार्य होगी। जेलेंस्की ने यह भी संकेत दिया कि यदि रूस अपनी सैन्य मौजूदगी कम करने और कब्जाए गए क्षेत्रों से पीछे हटने की स्पष्ट समयसीमा नहीं देता, तो वार्ता आगे बढ़ना मुश्किल होगा।
दूसरी ओर, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से यह संदेश दिया कि रूस सुरक्षा गारंटी और नाटो विस्तार जैसे मुद्दों पर ठोस आश्वासन चाहता है। रूसी पक्ष का तर्क है कि उनकी चिंताओं को नजरअंदाज कर केवल युद्धविराम की मांग करना व्यावहारिक नहीं है। मॉस्को का कहना है कि किसी भी स्थायी समझौते के लिए दोनों पक्षों को “यथार्थवादी” रुख अपनाना होगा।
इस पूरी प्रक्रिया में डोनाल्ड ट्रंप की भूमिका भी चर्चा में रही। अमेरिका की ओर से मध्यस्थता और कूटनीतिक दबाव बनाए रखने की कोशिश की जा रही है, लेकिन ट्रंप के हालिया बयानों ने कीव में असहजता पैदा की है। ट्रंप ने संकेत दिया था कि शांति के लिए “दोनों पक्षों को समझौता करना होगा,” जिसे यूक्रेन में इस रूप में देखा गया कि अमेरिका कीव पर अधिक दबाव डाल रहा है। हालांकि संयुक्त राज्य अमेरिका का आधिकारिक रुख यही है कि वह यूक्रेन की संप्रभुता का समर्थन करता रहेगा।
विश्लेषकों का मानना है कि जिनेवा वार्ता का अचानक ठंडा पड़ जाना यह दर्शाता है कि युद्ध केवल सैन्य संघर्ष नहीं, बल्कि गहरे राजनीतिक और रणनीतिक हितों का टकराव है। लाखों लोग विस्थापित हो चुके हैं, हजारों सैनिक और नागरिक अपनी जान गंवा चुके हैं, और बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा है। ऊर्जा आपूर्ति, खाद्य सुरक्षा और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी इस संघर्ष का असर पड़ा है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय समुदाय चाहता है कि बातचीत का सिलसिला जारी रहे, भले ही परिणाम तुरंत न निकले।
कूटनीतिक सूत्रों के अनुसार, वार्ता पूरी तरह विफल नहीं हुई है, बल्कि तकनीकी स्तर पर संवाद जारी रखने पर सहमति बनी है। युद्धबंदियों की अदला-बदली, मानवीय सहायता के सुरक्षित मार्ग और परमाणु संयंत्रों की सुरक्षा जैसे मुद्दों पर कुछ सकारात्मक संकेत मिले हैं। हालांकि मुख्य राजनीतिक प्रश्न—सीमा, सुरक्षा गारंटी और क्षेत्रीय नियंत्रण—अब भी अनसुलझे हैं।
फिलहाल, जिनेवा की यह बैठक उम्मीदों और आशंकाओं के बीच समाप्त हुई है। आने वाले हफ्तों में यह स्पष्ट होगा कि क्या दोनों पक्ष एक बार फिर बातचीत की मेज पर लौटेंगे या संघर्ष और लंबा खिंचेगा। विश्व समुदाय के लिए यह केवल दो देशों के बीच का युद्ध नहीं, बल्कि वैश्विक स्थिरता और कूटनीतिक संतुलन की परीक्षा बन चुका है।
