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सहारनपुर में कलेक्ट्रेट परिसर की मस्जिद पर बड़ा एक्शन, भारी पुलिस बल के बीच ढांचा ध्वस्त; ₹6.41 करोड़ का जुर्माना भी

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उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में जिला कलेक्ट्रेट परिसर के भीतर बनी मस्जिद को प्रशासन ने कोर्ट के आदेश के बाद ध्वस्त कर दिया। शनिवार सुबह हुई इस कार्रवाई के दौरान इलाके में भारी पुलिस बल तैनात रहा और प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी, ताकि किसी भी तरह की अप्रिय स्थिति पैदा न हो। करीब 70 साल पुराने इस ढांचे को सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे का मामला मानते हुए हटाया गया है।

मामला सहारनपुर के जिला कलेक्ट्रेट परिसर से जुड़ा है, जहां स्थित करीब 315 वर्ग मीटर जमीन को राजस्व रिकॉर्ड में सरकारी भूमि बताया गया था। इस जमीन पर बनी धार्मिक संरचना को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा था। शिकायत के बाद राजस्व विभाग ने जांच की और मामले को सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत के सामने रखा गया। अदालत ने सुनवाई के बाद परिसर खाली कराने और ढांचे को हटाने का आदेश दिया था।

अदालती आदेश के मुताबिक, जमीन को सरकारी संपत्ति माना गया और वहां लंबे समय से कथित अनधिकृत कब्जे के आधार पर कार्रवाई का निर्देश दिया गया। रिपोर्टों के अनुसार, अदालत ने करीब ₹6.41 करोड़ की क्षतिपूर्ति राशि भी निर्धारित की है। यह रकम लंबे समय तक सरकारी जमीन के कथित अनधिकृत इस्तेमाल के आधार पर तय की गई थी।

इस मामले की शुरुआत एक शिकायत से हुई थी। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि जिला कलेक्ट्रेट जैसे संवेदनशील सरकारी परिसर के भीतर धार्मिक ढांचे का मौजूद होना प्रशासनिक कामकाज और सुरक्षा व्यवस्था के लिहाज से उचित नहीं है। शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया था कि परिसर के कुछ हिस्सों का इस्तेमाल धार्मिक गतिविधियों के अलावा व्यावसायिक गतिविधियों के लिए किया जा रहा था।

मामले की जांच के दौरान राजस्व अधिकारियों ने जमीन के रिकॉर्ड की जांच की। अधिकारियों का दावा था कि संबंधित जमीन कलेक्ट्रेट और कचहरी परिसर का हिस्सा है और राजस्व रिकॉर्ड में सरकार के नाम दर्ज है। इसी आधार पर अदालत में अनधिकृत कब्जे का मामला रखा गया। दूसरी ओर, इस मामले से जुड़े पक्षों की दलीलों और आपत्तियों पर भी न्यायिक प्रक्रिया के तहत सुनवाई की गई।

अदालत ने अपने आदेश में संबंधित परिसर को खाली कराने का निर्देश दिया था। आदेश के तहत कब्जाधारियों को निर्धारित समय में परिसर खाली करने का मौका दिया गया था और समय सीमा पूरी होने के बाद प्रशासन को कार्रवाई करने का अधिकार मिला। इसके बाद अब प्रशासन ने पुलिस सुरक्षा के बीच ढांचे को हटाने की कार्रवाई की।

कार्रवाई के दौरान सुरक्षा को लेकर प्रशासन विशेष रूप से सतर्क रहा। कलेक्ट्रेट परिसर संवेदनशील सरकारी क्षेत्र होने के कारण बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई। प्रशासन का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि कार्रवाई के दौरान कानून-व्यवस्था की स्थिति न बिगड़े। फिलहाल उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक कार्रवाई शांतिपूर्ण तरीके से पूरी की गई।

यह मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि धार्मिक ढांचे को हटाने की कार्रवाई सीधे एक जिला प्रशासनिक परिसर में हुई है। प्रशासन की ओर से इसे धार्मिक विवाद के बजाय सरकारी जमीन पर कथित अनधिकृत कब्जे और अदालत के आदेश के अनुपालन की कार्रवाई के रूप में देखा जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि सरकारी परिसरों में सुरक्षा, गोपनीयता और प्रशासनिक कामकाज से जुड़े नियमों का पालन जरूरी है।

इस पूरे विवाद में करीब 70 वर्षों के कथित कब्जे का पहलू भी सामने आया है। अदालत ने इसी अवधि को ध्यान में रखते हुए सरकारी जमीन के इस्तेमाल के लिए क्षतिपूर्ति की गणना की थी। रिपोर्टों के मुताबिक, निर्धारित रकम ₹6.41 करोड़ से अधिक है। यह राशि किस आधार पर तय की गई, इसका उल्लेख अदालत के आदेश में किया गया है।

सहारनपुर में हुई यह कार्रवाई उत्तर प्रदेश में सरकारी जमीन पर कथित अनधिकृत धार्मिक निर्माण को लेकर चल रही कार्रवाइयों की व्यापक बहस के बीच सामने आई है। ऐसे मामलों में प्रशासन को एक तरफ अदालत के आदेशों का पालन करना होता है, वहीं दूसरी तरफ कानून-व्यवस्था और सामाजिक संवेदनशीलता को भी ध्यान में रखना पड़ता है।

फिलहाल सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर की मस्जिद को प्रशासन ने कोर्ट के आदेश के तहत ध्वस्त कर दिया है। अब इस मामले में आगे की प्रक्रिया सरकारी जमीन से संबंधित रिकॉर्ड, अदालत के आदेश और निर्धारित क्षतिपूर्ति की वसूली से जुड़ी होगी। प्रशासन की कार्रवाई के बाद इलाके में सुरक्षा व्यवस्था पर भी नजर रखी जा रही है।

कुल मिलाकर, सहारनपुर की यह कार्रवाई इसलिए बड़ी है क्योंकि जिस धार्मिक ढांचे को हटाया गया, वह सामान्य सार्वजनिक जमीन पर नहीं बल्कि जिला कलेक्ट्रेट जैसे संवेदनशील सरकारी परिसर के भीतर स्थित था। अदालत ने जमीन को सरकारी संपत्ति मानते हुए इसे अनधिकृत कब्जे से जुड़ा मामला माना और कार्रवाई का रास्ता साफ किया। अब यह मामला कानूनी और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर आगे भी चर्चा में बना रह सकता है।

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