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तेल आयात घटाने की दिशा में भारत का बड़ा कदम, ‘समुद्र मंथन’ योजना के तहत समुद्र में खोदे जाएंगे 60 गहरे तेल कुएं

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भारत सरकार ने देश को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने और कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करने के उद्देश्य से एक महत्वाकांक्षी योजना ‘समुद्र मंथन’ (नेशनल ऑफशोर एक्सप्लोरेशन स्कीम) शुरू की है। इस योजना के तहत अगले पांच वर्षों में देश के समुद्री क्षेत्रों में 60 गहरे और अति-गहरे (Deepwater और Ultra-Deepwater) तेल एवं गैस अन्वेषण कुएं खोदे जाएंगे। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इस योजना के लिए कुल 84,084 करोड़ रुपये के बजट को मंजूरी दी है। सरकार का मानना है कि इस पहल से देश के समुद्री क्षेत्रों में छिपे तेल और प्राकृतिक गैस के नए भंडारों की खोज होगी, जिससे भविष्य में ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के साथ-साथ आयात बिल में भी कमी लाई जा सकेगी।

योजना के तहत सबसे बड़ा खर्च गहरे समुद्र में ड्रिलिंग पर किया जाएगा। सरकार प्रत्येक गहरे समुद्री अन्वेषण कुएं की लागत का 50 प्रतिशत या अधिकतम 650 करोड़ रुपये तक वहन करेगी। इस मद में लगभग 43,200 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। विशेषज्ञों का कहना है कि गहरे समुद्र में तेल और गैस की खोज अत्यंत जोखिमपूर्ण और महंगी प्रक्रिया होती है। कई बार भारी निवेश के बावजूद व्यावसायिक रूप से उपयोगी भंडार नहीं मिलते, जिसके कारण निजी कंपनियां ऐसे क्षेत्रों में निवेश करने से बचती रही हैं। सरकार की यह वित्तीय सहायता इसी जोखिम को कम करने के उद्देश्य से दी जा रही है, ताकि सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्र की कंपनियां बड़े पैमाने पर समुद्री अन्वेषण में भागीदारी करें।

‘समुद्र मंथन’ योजना केवल तेल और गैस के कुएं खोदने तक सीमित नहीं है। इसके अंतर्गत उच्च गुणवत्ता वाले समुद्री भूकंपीय (Seismic) सर्वे, समुद्र के भीतर पाइपलाइन नेटवर्क, तटवर्ती प्रोसेसिंग सुविधाओं, साझा उत्पादन अवसंरचना तथा आधुनिक तकनीकों के विकास पर भी विशेष जोर दिया जाएगा। सरकार का उद्देश्य ऐसा साझा ढांचा तैयार करना है, जिससे भविष्य में किसी भी नई खोज का व्यावसायिक दोहन कम लागत और कम समय में किया जा सके। साथ ही घरेलू विनिर्माण, तकनीकी नवाचार और ‘मेक इन इंडिया’ अभियान को भी इस योजना से बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत अपनी जरूरत का लगभग 88 प्रतिशत कच्चा तेल और बड़ी मात्रा में प्राकृतिक गैस विदेशों से आयात करता है। वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक तनाव, विशेषकर पश्चिम एशिया में अस्थिरता, कच्चे तेल की कीमतों और आपूर्ति को प्रभावित करती रही है। ऐसे में घरेलू उत्पादन बढ़ाना देश की ऊर्जा सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सरकार का अनुमान है कि इस योजना के माध्यम से हर वर्ष 10 से 15 मिलियन टन ऑयल इक्विवेलेंट (MTOE) का अतिरिक्त उत्पादन संभव हो सकता है, जिससे तेल और गैस आयात पर निर्भरता में लगभग 3 से 5 प्रतिशत तक कमी लाई जा सकेगी।

इस योजना से वैश्विक ऊर्जा कंपनियों को भी भारत के अपतटीय (ऑफशोर) क्षेत्रों में निवेश के लिए प्रोत्साहन मिलेगा। ओपन एकरेज लाइसेंसिंग प्रोग्राम (OALP) के तहत पहले से आवंटित ब्लॉकों के साथ-साथ भविष्य में आवंटित क्षेत्रों में भी कंपनियां सरकारी सहायता का लाभ उठा सकेंगी। सरकार को उम्मीद है कि सार्वजनिक निवेश से निजी निवेश भी बढ़ेगा और समुद्री ऊर्जा क्षेत्र में नई तकनीकों तथा विशेषज्ञता का विकास होगा। इससे रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और भारत का ऊर्जा क्षेत्र अधिक प्रतिस्पर्धी बन सकेगा।

हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि गहरे समुद्र में तेल और गैस की खोज तकनीकी, पर्यावरणीय और वित्तीय दृष्टि से बेहद चुनौतीपूर्ण होती है। अत्याधुनिक उपकरणों, उच्च तकनीक और लंबे समय तक निवेश की आवश्यकता के कारण परियोजनाओं को सफल बनाना आसान नहीं होगा। इसके बावजूद सरकार का मानना है कि यदि योजना सफल रहती है तो आने वाले वर्षों में भारत के ऊर्जा क्षेत्र में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। घरेलू उत्पादन बढ़ने से विदेशी मुद्रा की बचत होगी, ऊर्जा आपूर्ति अधिक सुरक्षित होगी और देश आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम आगे बढ़ाएगा

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