भारत में सोलर पैनल और इससे जुड़े उपकरणों की मैन्युफैक्चरिंग तेजी से बढ़ रही है। 2018 में जहां भारत की सोलर पैनल निर्माण क्षमता 10 GW से कम थी, वहीं अब यह बढ़कर करीब 172 GW हो गई है। इस तेज बढ़ोतरी से वैश्विक सोलर बाजार में चीन के दबदबे को चुनौती मिल रही है।
सोलर मैन्युफैक्चरिंग में चीन अभी भी सबसे आगे है। IEA के आंकड़ों के मुताबिक, ग्लोबल स्तर पर मॉड्यूल निर्माण में चीन की हिस्सेदारी 74.7%, सेल में 85.1%, वेफर्स में 96.8% और पॉलिसिलिकॉन में 79.4% है। लेकिन भारत की बढ़ती उत्पादन क्षमता अब चीन के लिए एक महत्वपूर्ण प्रतिस्पर्धी चुनौती बन रही है।
भारत सरकार ने घरेलू सोलर उद्योग को बढ़ावा देने के लिए PLI योजना, विदेशी सोलर पैनलों पर आयात शुल्क और सरकारी परियोजनाओं में घरेलू निर्माताओं को प्राथमिकता जैसी नीतियां लागू की हैं। इसका असर चीन से होने वाले आयात पर भी दिखाई दिया है। 2020 में चीन से भारत आने वाले सोलर मॉड्यूल की मात्रा 8.2 GW थी, जो 2025 में घटकर 2.1 GW रह गई।
भारत की बढ़ती हिस्सेदारी का असर चीन के सोलर उद्योग पर भी दिखाई दे रहा है। जनवरी से अक्टूबर 2025 के दौरान चीन का सोलर एक्सपोर्ट सालाना आधार पर 13.2% घटकर 24.42 अरब डॉलर रह गया। चीन की कई बड़ी सोलर कंपनियां भी भारी घाटे से जूझ रही हैं। रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में चीन की 15 बड़ी कंपनियों में से 11 को करीब 50 अरब युआन का नुकसान हुआ।
हालांकि भारत के लिए अभी भी बड़ी चुनौती सोलर मैन्युफैक्चरिंग में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल और जरूरी कंपोनेंट्स की है। देश में पैनल बनाने की क्षमता तेजी से बढ़ी है, लेकिन कई महत्वपूर्ण हिस्सों के लिए अभी भी आयात पर निर्भरता बनी हुई है। इसी वजह से सरकार अब पॉलिसिलिकॉन और अन्य जरूरी कंपोनेंट्स का घरेलू उत्पादन बढ़ाने पर भी जोर दे रही है।
भारत की बढ़ती सोलर मैन्युफैक्चरिंग क्षमता देश की ऊर्जा सुरक्षा और आत्मनिर्भरता के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अगर भारत घरेलू स्तर पर सोलर सेल, वेफर्स और पॉलिसिलिकॉन जैसे जरूरी हिस्सों का उत्पादन भी बड़े पैमाने पर बढ़ाने में सफल होता है, तो चीन पर निर्भरता और कम हो सकती है। इससे भारत न सिर्फ अपने बढ़ते सोलर बाजार की जरूरत पूरी कर सकेगा, बल्कि आने वाले समय में वैश्विक सोलर सप्लाई चेन में भी बड़ी भूमिका निभा सकता है।
