भारत और श्रीलंका के बीच रक्षा और रणनीतिक संबंधों को लेकर बुधवार को एक अहम घटनाक्रम सामने आया। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने श्रीलंका के राष्ट्रपति अनुरा कुमार दिसानायके से मुलाकात की। दोनों नेताओं के बीच क्षेत्रीय शांति, सुरक्षा और दोनों देशों के बीच सहयोग को मजबूत करने को लेकर चर्चा हुई। बैठक के दौरान श्रीलंकाई राष्ट्रपति ने स्पष्ट संदेश दिया कि उनका देश अपनी जमीन का इस्तेमाल भारत के सुरक्षा हितों के खिलाफ किसी भी गतिविधि के लिए नहीं होने देगा।
राष्ट्रपति अनुरा कुमार दिसानायके ने भारत को भरोसा दिलाया कि श्रीलंका की धरती से ऐसी कोई गतिविधि नहीं होने दी जाएगी, जो भारत के सुरक्षा हितों के लिए नुकसानदेह हो। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ हुई पिछली मुलाकातों का भी उल्लेख किया और इसी प्रतिबद्धता को दोहराया। हिंद महासागर क्षेत्र में बदलते रणनीतिक समीकरणों के बीच श्रीलंका का यह रुख भारत के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
राजनाथ सिंह की यह यात्रा भी इसलिए अहम है क्योंकि लंबे समय बाद किसी भारतीय रक्षा मंत्री का श्रीलंका दौरा हुआ है। बैठक में दोनों देशों ने खुद को सभ्यतागत रूप से जुड़े हुए, करीबी पड़ोसी और समुद्री साझेदार के तौर पर बताया। दोनों पक्षों ने इस बात पर जोर दिया कि भारत और श्रीलंका अपने-अपने देशों के विकास के साथ-साथ दोनों देशों की जनता के हितों के लिए मिलकर काम करते रहेंगे।
बैठक के दौरान रक्षा सहयोग को लेकर भी कई महत्वपूर्ण फैसले हुए। भारत और श्रीलंका के बीच 3 समझौता ज्ञापनों का आदान-प्रदान किया गया। इनमें श्रीलंकाई वायुसेना की 6 एल-70 एयर डिफेंस गनों को अपग्रेड करने से जुड़ा समझौता भी शामिल है। यह अपग्रेड भारत सरकार की ओर से दिए जाने वाले अनुदान के तहत किया जाएगा। माना जा रहा है कि इससे श्रीलंका में महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों की हवाई सुरक्षा क्षमता को मजबूत करने में मदद मिलेगी।
एल-70 गन की खास बात यह है कि इनकी आपूर्ति पहले भारत की ओर से श्रीलंकाई वायुसेना को की गई थी। अब इन्हीं प्रणालियों को आधुनिक बनाने की दिशा में दोनों देश आगे बढ़ रहे हैं। इसके अलावा भारत और श्रीलंका के राष्ट्रीय कैडेट कोर तथा नेशनल डिफेंस कॉलेज के बीच सहयोग को लेकर भी समझौते किए गए हैं। इससे दोनों देशों के रक्षा संस्थानों के बीच संपर्क और प्रशिक्षण सहयोग बढ़ने की उम्मीद है।
राजनाथ सिंह ने इस दौरान कहा कि भारत श्रीलंका को अपना करीबी मित्र और पड़ोसी मानता है। उन्होंने कहा कि संकट के समय श्रीलंका की मदद करना भारत के लिए केवल किसी तरह का एहसान नहीं, बल्कि अपनी जिम्मेदारी निभाना है। भारत भविष्य में भी मुश्किल परिस्थितियों में श्रीलंका के साथ खड़ा रहेगा। दोनों देशों के बीच हाल के वर्षों में आर्थिक, मानवीय और सुरक्षा सहयोग को देखते हुए यह संदेश काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
भारत के लिए श्रीलंका का महत्व केवल पड़ोसी देश होने तक सीमित नहीं है। हिंद महासागर में श्रीलंका की रणनीतिक स्थिति इसे क्षेत्रीय सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण बनाती है। समुद्री मार्गों की सुरक्षा, क्षेत्रीय स्थिरता और हिंद महासागर में बढ़ती बाहरी शक्तियों की मौजूदगी के बीच भारत लगातार श्रीलंका के साथ रक्षा और समुद्री सहयोग मजबूत करने पर जोर देता रहा है। इसी संदर्भ में श्रीलंकाई राष्ट्रपति का भारत के खिलाफ अपनी जमीन के इस्तेमाल की अनुमति नहीं देने वाला बयान नई दिल्ली के लिए अहम माना जा रहा है।
श्रीलंका का यह रुख ऐसे समय में सामने आया है जब हिंद महासागर क्षेत्र में रणनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है। ऐसे में कोलंबो का यह आश्वासन भारत की सुरक्षा चिंताओं के लिहाज से महत्वपूर्ण है। हालांकि, इस बयान को किसी तीसरे देश के खिलाफ सीधे तौर पर उठाया गया कदम मानने के बजाय भारत और श्रीलंका के बीच द्विपक्षीय सुरक्षा समझ के तौर पर देखना ज्यादा उचित होगा।
राजनाथ सिंह की श्रीलंका यात्रा को भारत की ‘Neighbourhood First’ नीति और हिंद महासागर क्षेत्र में शांति, सुरक्षा तथा स्थिरता के प्रति उसकी प्रतिबद्धता से भी जोड़कर देखा जा रहा है। दोनों देशों ने आने वाले समय में रक्षा, समुद्री सुरक्षा और संस्थागत सहयोग को और मजबूत करने पर जोर दिया है।
