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CJI सूर्यकांत के भाई को फोन कर फैसले पर उठाए सवाल, सुप्रीम कोर्ट सख्त—“हिम्मत कैसे हुई?”

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Supreme Court of India में एक अहम सुनवाई के दौरान उस वक्त गंभीर स्थिति पैदा हो गई जब यह सामने आया कि एक याचिकाकर्ता के पिता ने सीधे चीफ जस्टिस सूर्यकांत के भाई को फोन कर अदालत के फैसले पर सवाल उठाए। इस घटना पर सीजेआई ने कड़ी नाराजगी जाहिर करते हुए इसे न्यायपालिका की स्वतंत्रता और गरिमा पर सीधा हमला बताया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह बेहद गंभीर मामला है और किसी भी व्यक्ति को यह अधिकार नहीं है कि वह न्यायाधीशों के निजी जीवन में दखल देकर न्यायिक आदेशों को प्रभावित करने की कोशिश करे।

दरअसल यह पूरा मामला हरियाणा के निखिल और एकता पुनिया से जुड़ा है, जिन्होंने मेडिकल कॉलेज में दाखिले के लिए बौद्ध अल्पसंख्यक प्रमाण पत्र के आधार पर आरक्षण का लाभ लेने की कोशिश की थी। याचिकाकर्ताओं का दावा था कि उन्हें अल्पसंख्यक कोटे के तहत प्रवेश मिलना चाहिए, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए इसे व्यवस्था का दुरुपयोग और धोखाधड़ी की श्रेणी में माना। अदालत ने साफ कहा कि इस तरह के फर्जी या संदिग्ध प्रमाण पत्र के जरिए मेडिकल सीट हासिल करने की कोशिश न केवल गलत है, बल्कि यह योग्य छात्रों के अधिकारों का भी हनन है।

सुनवाई के दौरान जब यह जानकारी सामने आई कि फैसले के बाद याचिकाकर्ता के पिता ने सीजेआई के भाई से संपर्क किया और आदेश को लेकर सवाल खड़े किए, तो अदालत का रुख और सख्त हो गया। सूर्यकांत ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “यह कैसे संभव है कि कोई व्यक्ति मेरे परिवार के सदस्य को फोन करे और अदालत के फैसले पर सवाल उठाए? उसकी हिम्मत कैसे हुई?” उन्होंने इस कृत्य को न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप बताते हुए कहा कि यह सीधा-सीधा अवमानना (Contempt of Court) का मामला बनता है।

सीजेआई ने संबंधित वकील को भी फटकार लगाई और कहा कि ऐसे मामलों में वकीलों की जिम्मेदारी बनती है कि वे अपने मुवक्किल को कानून की सीमाओं के बारे में समझाएं। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर इस तरह की घटनाओं पर सख्ती नहीं बरती गई, तो न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर गंभीर असर पड़ सकता है। अदालत ने संकेत दिया कि इस मामले में अवमानना की कार्यवाही शुरू की जा सकती है ताकि भविष्य में कोई भी व्यक्ति इस तरह का कदम उठाने से पहले दस बार सोचे।

यह पूरा घटनाक्रम न्यायपालिका की गरिमा, पारदर्शिता और स्वतंत्रता के महत्व को एक बार फिर उजागर करता है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ संदेश दिया है कि न्यायिक फैसलों को प्रभावित करने या उन पर बाहरी दबाव बनाने की किसी भी कोशिश को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई की जाएगी।

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