भारत में दो से ज्यादा बच्चे होने पर स्थानीय निकायों का चुनाव लड़ने से रोकने वाले कानूनों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा सवाल उठाया है। अदालत ने कहा है कि देश में तेजी से घटती प्रजनन दर को देखते हुए ऐसे कानून अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं। पहले इन नियमों का आधार बढ़ती आबादी को नियंत्रित करना था, लेकिन पिछले कुछ दशकों में भारत की जनसांख्यिकीय स्थिति काफी बदल गई है। कोर्ट ने इस मुद्दे पर अपने पुराने फैसले पर दोबारा विचार करने की जरूरत बताते हुए मामला बड़ी बेंच के पास भेज दिया है।
यह टिप्पणी जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने महाराष्ट्र की पूर्व सरपंच मंगला भीमराव इंगले की याचिका पर सुनवाई के दौरान की। मंगला को तीसरे बच्चे के जन्म के बाद महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम, 1959 के तहत अयोग्य ठहरा दिया गया था। इस कानून के अनुसार, दो से अधिक बच्चे होने पर कोई व्यक्ति पंचायत सदस्य या सरपंच का पद हासिल नहीं कर सकता और न ही उस पद पर बना रह सकता है।
मंगला ने अपनी अयोग्यता को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, लेकिन वहां से उन्हें राहत नहीं मिली। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान न केवल उनके मामले में राहत दी, बल्कि देश में दो बच्चों की अनिवार्यता से जुड़े कानूनों की संवैधानिक वैधता पर भी व्यापक सवाल उठाए। पीठ ने इस मुद्दे को बड़ी बेंच के विचार के लिए भेजा है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने भारत की कुल प्रजनन दर यानी टोटल फर्टिलिटी रेट (TFR) में आई गिरावट का खास तौर पर उल्लेख किया। कोर्ट के मुताबिक, साल 2003 में भारत की प्रजनन दर करीब 3 थी, जो अब घटकर 1.9 रह गई है। वहीं, 2.1 की प्रजनन दर को रिप्लेसमेंट रेट कहा जाता है। इसका मतलब है कि इस स्तर पर एक पीढ़ी अपनी संख्या को अगली पीढ़ी से लगभग बनाए रख सकती है।
अदालत ने चेतावनी दी कि प्रजनन दर का रिप्लेसमेंट स्तर से नीचे जाना आने वाले समय में देश की जनसंख्या संरचना को प्रभावित कर सकता है। भले ही भारत की कुल आबादी अभी घट नहीं रही है, लेकिन भविष्य में बुजुर्गों की संख्या बढ़ने और कामकाजी उम्र के लोगों की हिस्सेदारी कम होने की आशंका है। ऐसे में केवल आबादी नियंत्रित करने के पुराने तर्क के आधार पर दो बच्चों की सीमा लागू रखना उचित नहीं हो सकता।
पीठ ने यह भी कहा कि दो से अधिक बच्चे होने के आधार पर लोगों को चुनाव लड़ने से रोकना उन्हें लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हिस्सा लेने से वंचित कर सकता है। अदालत के मुताबिक, इस तरह के नियमों का किसी व्यक्ति की सार्वजनिक पद संभालने की क्षमता से सीधा संबंध नहीं है। इससे लोगों के सामने परिवार बढ़ाने और चुनावी राजनीति में भाग लेने के बीच अनुचित विकल्प खड़ा होता है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाली प्रजनन स्वायत्तता के अधिकार से जुड़ा गंभीर सवाल है।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपने 2003 के जावेद बनाम हरियाणा राज्य फैसले पर भी दोबारा विचार करने की जरूरत बताई है। उस फैसले में तीन जजों की पीठ ने हरियाणा पंचायती राज अधिनियम, 1994 के दो बच्चों वाले नियम को संवैधानिक रूप से वैध माना था। अब मौजूदा पीठ ने बदलती जनसांख्यिकीय परिस्थितियों को देखते हुए इस पुराने फैसले को बड़ी बेंच के पास भेज दिया है, ताकि इस नियम की वैधता पर फिर से विचार किया जा सके।
देश के सभी राज्यों में दो बच्चों का नियम एक जैसा लागू नहीं है। अदालत के सामने पेश की गई जानकारी के मुताबिक, सात राज्यों ने ऐसे प्रावधानों को वापस ले लिया है, जबकि 15 राज्यों में इस तरह की पाबंदी है ही नहीं। असम, गोवा, गुजरात, महाराष्ट्र, ओडिशा और उत्तराखंड उन राज्यों में शामिल हैं, जहां दो बच्चों से जुड़े प्रतिबंध अब भी मौजूद हैं। अब बड़ी बेंच के फैसले से यह तय करने में मदद मिलेगी कि स्थानीय निकाय चुनावों में दो बच्चों की अनिवार्यता जैसे नियम संविधान और मौजूदा सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप हैं या नहीं।
