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मध्य पूर्व में युद्ध का फैलता ज्वालामुखी

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मध्य पूर्व में पिछले कुछ दिनों से जारी तनाव अब एक बड़े अंतरराष्ट्रीय संघर्ष का रूप ले चुका है, जिसमें संयुक्त राज्य अमेरिका और इज़राइल ने ईरान के खिलाफ ठोस सैन्य अभियान शुरू किया है और इसके परिणामस्वरूप पूरी दुनिया के सामने एक नई, जटिल और खतरनाक स्थिति खड़ी हो गई है। यह संकट विशेष रूप से ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की reported मौत के बाद और भी तीव्र हो गया है, जिसने संघर्ष को और अधिक उग्र रूप दे दिया है।

संयुक्त अमेरिकी-इज़राइली ऑपरेशन के तहत तेहरान और अन्य महत्वपूर्ण इलाकों में हवाई हमलों की घोषणा की गई, जिनमें ईरानी सरकारी और सैन्य संरचनाओं को निशाना बनाया गया है। इन हमलों ने ईरान में भारी संख्या में जान-माल का नुकसान किया और एक बड़े स्तर पर क्षति की खबरें सामने आईं। सिर्फ़ सैन्य ठिकानों को ही नहीं, बल्कि ईरान के प्रमुख सत्ता केंद्रों और रणनीतिक प्रतिष्ठानों पर भी लक्षित हमले किए गए हैं।

यह संघर्ष कुछ समय पहले तक कूटनीतिक दबाव और तनाव की सीमा में था, लेकिन खामेनेई की मौत के बाद ईरान ने कड़े प्रतिशोधी कदम उठाए हैं। ईरानी इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने विभिन्न मध्य पूर्वी देशों में अमेरिकी और इज़राइली हितों पर हमले तेज कर दिए हैं, जिसमें मिसाइल और ड्रोन हमले शामिल हैं, जिससे तेल निर्यात मार्गों पर भी असर पड़ा है और ह्रूमज़ जलडमरूमध्य सहित झंझटें उत्पन्न हुई हैं।

संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस संघर्ष को “सैन्य अभियान” कहा है और प्रारंभ में यह दावा किया कि यह चार से पांच हफ्तों में समाप्त हो सकता है। हालांकि बाद में उन्होंने संकेत दिया कि आवश्यकता पड़ने पर युद्ध और भी लंबे समय तक जारी रह सकता है और इसमें ground troops यानी प़त्थर सैनिकों की तैनाती तक की बात पर विचार किया जा सकता है। ट्रंप के अनुसार यह कार्रवाइयां केवल ईरान की मिसाइल प्रणालियों, नौसेना और संभावित परमाणु क्षमताओं को निष्क्रिय करने के लिए हैं।

वहीं इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने स्वीकार किया है कि यह युद्ध “समय ले सकता है” लेकिन पिछले मध्य पूर्वी संघर्षों की तरह लंबा नहीं होगा। उन्होंने यह भी कहा कि इस संघर्ष से ईरान में राजनीतिक बदलाव या शासन परिवर्तन की प्रक्रिया को गति मिल सकती है, हालांकि सीधे तौर पर ऐसा नहीं कहा जा रहा।

इस बीच, संघर्ष के प्रभावों ने सिर्फ़ सैन्य मोर्चे को ही नहीं बल्कि आर्थिक और सामाजिक क्षेत्रों को भी प्रभावित किया है। वैश्विक तेल बाजारों में अस्थिरता बढ़ी है, जहाज़ों और व्यापार मार्गों पर भारी कठिनाइयाँ आई हैं, वहीं शांतिप्रिय प्रदर्शन और विरोध भी विभिन्न देशों में देखने को मिल रहे हैं, जिससे युद्ध के खिलाफ आवाज़ें भी तेज हुई हैं।

अन्य देशों और क्षेत्रीय शक्तियों ने भी इस संघर्ष का समर्थन या निंदात्मक बयान जारी किया है, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि यह स्थानीय संघर्ष नहीं बल्कि एक व्यापक क्षेत्रीय और वैश्विक समस्या बन चुकी है। इस समय कूटनीतिक प्रयास और संघर्ष विराम की संभावनाएँ मुश्किल दिखाई दे रही हैं, और विशेषज्ञों का मानना है कि यह युद्ध वैश्विक राजनीतिक और सुरक्षा ढांचे पर दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकता है।

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