पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में 2026 के विधानसभा चुनावों को लेकर राजनीतिक माहौल पूरी तरह गर्म हो चुका है। एक ओर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी आक्रामक प्रचार कर रही है, वहीं दूसरी ओर ममता बनर्जी अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) के साथ सत्ता में वापसी के लिए जोरदार अभियान चला रही हैं। चुनावी तारीखों के करीब आते ही दोनों पक्षों के बीच जुबानी जंग भी तेज हो गई है, जिससे सियासी माहौल और ज्यादा तनावपूर्ण बन गया है।
पश्चिम बंगाल में मतदान दो चरणों—23 और 29 अप्रैल—को होना है, जबकि तमिलनाडु में एक ही चरण में 23 अप्रैल को वोटिंग होगी और 4 मई को नतीजे घोषित किए जाएंगे। इस बीच चुनाव आयोग ने निष्पक्ष मतदान सुनिश्चित करने के लिए सख्त कदम उठाते हुए “ड्राई डे” लागू करने जैसे निर्देश जारी किए हैं, ताकि मतदाताओं को प्रभावित करने की किसी भी कोशिश को रोका जा सके।
चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने पश्चिम बंगाल की ममता सरकार पर “अराजकता, भ्रष्टाचार और तुष्टिकरण की राजनीति” के आरोप लगाए हैं। वहीं ममता बनर्जी ने पलटवार करते हुए बीजेपी पर चुनावी नियमों के उल्लंघन और सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग का आरोप लगाया है। इसके अलावा ममता बनर्जी ने मोदी के कुछ चुनावी कार्यक्रमों को “ड्रामा” तक करार दिया, जिससे राजनीतिक बयानबाजी और तेज हो गई है।
राजनीतिक संघर्ष सिर्फ बयानबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि जमीनी स्तर पर भी इसका असर साफ दिखाई दे रहा है। ममता बनर्जी खुद को जनता के बीच सीधे पहुंचाने के लिए डोर-टू-डोर कैंपेन कर रही हैं और लोगों से व्यक्तिगत संपर्क साध रही हैं। वहीं बीजेपी भी बड़े-बड़े रैलियों और घोषणाओं के जरिए मतदाताओं को लुभाने की कोशिश कर रही है, जिसमें महिलाओं और गरीब वर्ग के लिए कई योजनाओं का वादा किया जा रहा है।
इस चुनाव में मुख्य मुकाबला पश्चिम बंगाल में TMC और बीजेपी के बीच माना जा रहा है, जबकि कांग्रेस और वाम दल भी अपनी जमीन वापस पाने की कोशिश में जुटे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार चुनाव “एंटी-इनकंबेंसी” यानी सत्ता विरोधी लहर और मजबूत संगठन के बीच सीधी टक्कर बन गया है।
तमिलनाडु में भी मुकाबला कम दिलचस्प नहीं है, जहां क्षेत्रीय दलों का प्रभाव मजबूत है और गठबंधन राजनीति अहम भूमिका निभा रही है। यहां भी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय मुद्दों का मिश्रण चुनावी रणनीति को प्रभावित कर रहा है।
कुल मिलाकर, 2026 के ये विधानसभा चुनाव सिर्फ राज्यों की सत्ता का फैसला नहीं करेंगे, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति की दिशा भी तय कर सकते हैं। दोनों राज्यों में जिस तरह से प्रचार और राजनीतिक टकराव बढ़ रहा है, उससे साफ है कि आने वाले दिनों में चुनावी माहौल और ज्यादा गरमाने वाला है।
