जम्मू-कश्मीर के कश्मीर घाटी से धार्मिक सद्भाव और साझा विरासत से जुड़ी एक कहानी सामने आई है। जाहूर अहमद डार नाम के एक मुस्लिम व्यक्ति ने दावा किया है कि उन्होंने कश्मीर के 111 मंदिरों की देखभाल और संरक्षण में भूमिका निभाई है। उनके मुताबिक, इन मंदिरों की सेवा को उन्होंने केवल धार्मिक जिम्मेदारी के तौर पर नहीं, बल्कि कश्मीर की साझा संस्कृति और विरासत को बचाने के प्रयास के रूप में देखा है। उनकी कहानी ऐसे समय सामने आई है, जब घाटी में पुराने मंदिरों और धार्मिक स्थलों के संरक्षण को लेकर लगातार चर्चा होती रही है।
जाहूर अहमद डार के मुताबिक, कश्मीर के मंदिर केवल एक समुदाय की धार्मिक आस्था से जुड़े स्थल नहीं हैं, बल्कि वे घाटी के इतिहास और सामाजिक जीवन का भी हिस्सा रहे हैं। उन्होंने इन मंदिरों की देखभाल के दौरान साफ-सफाई, परिसर की सुरक्षा और जरूरी रखरखाव जैसे कामों में योगदान देने की बात कही है। उनका कहना है कि धार्मिक पहचान अलग हो सकती है, लेकिन किसी ऐतिहासिक या धार्मिक स्थल की रक्षा करना पूरी समाज की जिम्मेदारी है।
डार की ओर से किया गया 111 मंदिरों की देखभाल का दावा स्थानीय स्तर पर चर्चा का विषय बना हुआ है। हालांकि, अलग-अलग मंदिरों की देखभाल और उनके प्रबंधन से जुड़ी व्यवस्थाएं अलग हो सकती हैं, इसलिए उनके दावे के हर हिस्से की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है। कश्मीर में कई मंदिर ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व रखते हैं और इनके संरक्षण में स्थानीय समुदायों तथा धार्मिक संस्थाओं की भूमिका भी रही है।
जम्मू-कश्मीर के मुख्य सचिव अतल डुल्लू ने भी हाल ही में श्रीनगर के शीतलनाथ मंदिर का दौरा करते हुए धार्मिक स्थलों को साझा विरासत बताया था। उन्होंने कहा था कि ऐसे स्थलों की रक्षा करना पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने शीतलनाथ मंदिर को कश्मीर की विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए कहा कि इसे आने वाली पीढ़ियों तक संरक्षित रखना जरूरी है।
कश्मीर के कई मंदिरों का इतिहास घाटी की सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ा रहा है। शीतलनाथ जैसे मंदिर धार्मिक गतिविधियों के साथ-साथ सामाजिक मेलजोल के केंद्र भी रहे हैं। अधिकारियों के अनुसार, अतीत में यहां धार्मिक आयोजनों के अलावा समुदाय से जुड़े कार्यक्रम भी होते रहे हैं। यह पहलू कश्मीर की उस साझा सामाजिक विरासत को सामने लाता है जिसमें अलग-अलग समुदायों की भागीदारी रही है।
घाटी में मंदिरों और धार्मिक स्थलों के संरक्षण का मुद्दा लंबे समय से महत्वपूर्ण रहा है। कुछ प्रमुख मंदिरों की देखरेख धार्मिक ट्रस्ट और स्थानीय संस्थाओं के माध्यम से होती है। जम्मू-कश्मीर में धमार्थ ट्रस्ट समेत विभिन्न संस्थाएं कई प्रमुख मंदिरों और धार्मिक स्थलों के प्रबंधन से जुड़ी रही हैं।
जाहूर अहमद डार की कहानी इसी व्यापक संदर्भ में सामने आती है। उनके अनुसार, मंदिरों की देखभाल करते समय उन्होंने इसे किसी एक धर्म की सेवा के रूप में नहीं देखा। उनका जोर इस बात पर है कि कश्मीर की पुरानी धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखना आने वाली पीढ़ियों के लिए जरूरी है। उनके इस दावे को लेकर स्थानीय स्तर पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ सकती हैं, लेकिन मंदिरों के संरक्षण में समुदायों की भागीदारी का विषय कश्मीर की साझा विरासत की चर्चा से जुड़ा हुआ है।
कश्मीर में लंबे समय से यह बहस होती रही है कि पुराने धार्मिक स्थलों और उनकी सांस्कृतिक पहचान को किस तरह सुरक्षित रखा जाए। ऐसे में स्थानीय लोगों की भागीदारी, धार्मिक संस्थाओं की जिम्मेदारी और प्रशासन की भूमिका तीनों महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। मंदिरों की देखभाल से जुड़े दावों की वास्तविक स्थिति संबंधित रिकॉर्ड और स्थानीय प्रशासनिक जानकारी से स्पष्ट हो सकती है, जबकि डार का दावा फिलहाल उनके बताए अनुभवों पर आधारित है।
