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क्या दोहराएगा 1980 जैसा इतिहास? सोने में बड़ी गिरावट की आशंका पर तेज हुई बहस

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सोने की कीमतों में हाल के महीनों में आई तेज गिरावट ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में रिकॉर्ड ऊंचाई छूने के बाद सोना लगातार दबाव में है, जिसके चलते बाजार में यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या इतिहास खुद को दोहराएगा और सोने में 1980 जैसी बड़ी गिरावट देखने को मिल सकती है। हालांकि इस मुद्दे पर विशेषज्ञों की राय बंटी हुई है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों में सोने में और गिरावट की संभावना बनी हुई है, जबकि कई बड़े निवेश संस्थानों का कहना है कि बाजार में उतार-चढ़ाव के बावजूद 1980 जैसी भारी गिरावट की संभावना फिलहाल कम दिखाई देती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि जनवरी 2026 में सोने ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में लगभग 5,595 डॉलर प्रति औंस का नया रिकॉर्ड स्तर बनाया था। इसके बाद मुनाफावसूली, वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों में बदलाव और ब्याज दरों को लेकर बढ़ी अनिश्चितता के कारण कीमतों में तेज नरमी देखने को मिली। कई तकनीकी विश्लेषकों का मानना है कि जब कोई संपत्ति बहुत तेजी से अपने वास्तविक मूल्य से ऊपर निकल जाती है, तो उसमें सुधार (Correction) आना सामान्य प्रक्रिया होती है। इसी वजह से कुछ बाजार विशेषज्ञ अभी भी सोने में और गिरावट की आशंका जता रहे हैं।

1980 की ऐतिहासिक गिरावट का उदाहरण आज भी निवेशकों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। उस समय ईरान संकट और बढ़ती महंगाई के कारण सोने की कीमतें रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गई थीं। बाद में अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने महंगाई पर नियंत्रण पाने के लिए ब्याज दरों में भारी बढ़ोतरी की, जिसके बाद सोने की कीमतों में 60 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई। इसके अलावा वर्ष 2011 से 2015 के बीच भी सोने में लगभग 45 प्रतिशत की कमजोरी देखने को मिली थी। यही कारण है कि वर्तमान गिरावट की तुलना इन ऐतिहासिक घटनाओं से की जा रही है।

हालांकि सभी विशेषज्ञ इस तुलना से सहमत नहीं हैं। कई वैश्विक निवेश संस्थानों का मानना है कि मौजूदा आर्थिक परिस्थितियां 1980 से काफी अलग हैं। उनके अनुसार दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों द्वारा लगातार सोने की खरीद, भू-राजनीतिक तनाव और सुरक्षित निवेश की बढ़ती मांग सोने को मजबूत आधार प्रदान कर रही है। ऐसे में कीमतों में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है, लेकिन 50 प्रतिशत या उससे अधिक की गिरावट की संभावना सीमित मानी जा रही है।

भारतीय निवेशकों के लिए स्थिति कुछ अलग मानी जाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों में बड़ी गिरावट आने पर भी भारत में उसका पूरा असर दिखाई नहीं देता। इसकी मुख्य वजह डॉलर के मुकाबले रुपये की चाल, आयात शुल्क और अन्य कर हैं। यही कारण है कि वैश्विक बाजार में बड़ी गिरावट के बावजूद घरेलू बाजार में कीमतों में अपेक्षाकृत कम कमी दर्ज होती है। इस वजह से भारतीय निवेशकों को निवेश का निर्णय केवल अंतरराष्ट्रीय कीमतों के आधार पर नहीं, बल्कि घरेलू आर्थिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर लेना चाहिए।

बाजार विश्लेषकों का कहना है कि मौजूदा समय में निवेशकों को घबराकर फैसले लेने के बजाय लंबी अवधि की रणनीति अपनानी चाहिए। सोने में उतार-चढ़ाव नई बात नहीं है और इतिहास बताता है कि बड़ी गिरावट के बाद भी यह धातु समय के साथ फिर मजबूत वापसी करती रही है। ऐसे में आने वाले महीनों में अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति, वैश्विक महंगाई, डॉलर की मजबूती और भू-राजनीतिक घटनाक्रम सोने की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

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