मध्य प्रदेश की दतिया विधानसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी के भीतर बड़ा राजनीतिक संकट सामने आ गया है। पार्टी द्वारा पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा की जगह आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार घोषित किए जाने के बाद कार्यकर्ताओं और समर्थकों में जबरदस्त नाराजगी देखने को मिली। टिकट बदलने के फैसले के विरोध में बड़ी संख्या में समर्थक सड़कों पर उतर आए, कई स्थानों पर प्रदर्शन किए गए और मुख्य हाईवे को जाम कर विरोध जताया गया। प्रदर्शनकारियों ने टायर जलाकर नारेबाजी की और पार्टी नेतृत्व से उम्मीदवार बदलने की मांग की। इस घटनाक्रम ने उपचुनाव से पहले भाजपा के सामने संगठनात्मक चुनौती खड़ी कर दी है।
विरोध केवल सड़क तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पार्टी संगठन में भी इसका असर साफ दिखाई दिया। भाजपा के जिला अध्यक्ष रघुवीर सिंह कुशवाह ने अपनी पूरी जिला कार्यकारिणी के साथ सामूहिक इस्तीफे की घोषणा कर दी। उनके साथ कई स्थानीय पदाधिकारियों, जनप्रतिनिधियों और संगठन से जुड़े कार्यकर्ताओं ने भी अपने पद छोड़ने का फैसला लिया। इस्तीफे में आरोप लगाया गया कि उम्मीदवार चयन का निर्णय स्थानीय कार्यकर्ताओं की राय और संगठन की भावनाओं की अनदेखी करते हुए लिया गया है। साथ ही चेतावनी दी गई कि यदि पार्टी अपने फैसले पर पुनर्विचार नहीं करती है तो आगे और बड़े स्तर पर विरोध किया जाएगा।
प्रदर्शन कर रहे समर्थकों का कहना है कि डॉ. नरोत्तम मिश्रा लंबे समय से दतिया क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं और उन्होंने विकास कार्यों के माध्यम से जनता के बीच मजबूत पहचान बनाई है। उनका दावा है कि उपचुनाव की तैयारियों में भी वे लगातार जुटे हुए थे, ऐसे में अंतिम समय पर टिकट बदलने का फैसला कार्यकर्ताओं के लिए अप्रत्याशित रहा। समर्थकों ने यह भी कहा कि नए उम्मीदवार को क्षेत्र में अपेक्षित जनाधार प्राप्त नहीं है और पार्टी को चुनावी नुकसान उठाना पड़ सकता है यदि निर्णय में बदलाव नहीं किया गया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा ने यह फैसला पिछले विधानसभा चुनाव के परिणामों, संगठनात्मक फीडबैक और आंतरिक सर्वेक्षण के आधार पर लिया है। वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार राजेंद्र भारती ने डॉ. नरोत्तम मिश्रा को हराया था। बाद में राजेंद्र भारती की सदस्यता समाप्त होने के कारण दतिया सीट पर उपचुनाव की स्थिति बनी। इसी बीच पार्टी नेतृत्व ने इस बार नया चेहरा उतारने का निर्णय लिया, लेकिन इस फैसले ने स्थानीय संगठन के भीतर असंतोष को खुलकर सामने ला दिया।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भाजपा नेतृत्व नाराज कार्यकर्ताओं को मनाने में सफल होगा या फिर यह आंतरिक असंतोष उपचुनाव में पार्टी के प्रदर्शन को प्रभावित करेगा। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी तेज है कि आने वाले दिनों में पार्टी वरिष्ठ नेताओं के माध्यम से स्थिति को संभालने की कोशिश कर सकती है। फिलहाल दतिया का उपचुनाव केवल भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबला नहीं रह गया है, बल्कि भाजपा के भीतर उभरे असंतोष और संगठनात्मक एकजुटता की भी बड़ी परीक्षा बन गया है। पूरे प्रदेश की नजर अब इस बात पर टिकी है कि पार्टी नेतृत्व इस संकट का समाधान किस तरह निकालता है और चुनावी मैदान में एकजुट होकर उतरने में कितना सफल रहता है।
