
पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर बढ़ते विवाद के बीच तृणमूल कांग्रेस (TMC) के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी ने चुनाव आयोग (EC) पर तीखे आरोप लगाते हुए उसे “व्हाट्सएप आयोग” कह दिया है, जिससे राजनीतिक व सार्वजनिक स्तर पर सियासी तापमान चरम पर पहुंच गया है। बनर्जी ने आरोप लगाया है कि बंगाल में चल रहे एसआईआर अभियान में मतदाताओं को परेशान और भ्रमित किया जा रहा है, जबकि चुनाव आयोग इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया बता रहा है। टीएमसी ने चल रही प्रक्रियाओं और कथित खामियों को लेकर 31 दिसंबर को एक 10 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल के साथ मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार से मिलने का निर्णय भी लिया है।
एसआईआर की शुरुआत के साथ ही राज्य भर में विशेष सुनवाई शिविर (SIR camps) लगाए गए हैं, जिनमें हजारों “अज्ञात” मतदाता जिन्हें 2002 की मतदाता सूची से लिंक नहीं माना गया, को बुलाया गया। कई मतदाता, जिनके पास आधार, वोटर कार्ड और राशन कार्ड जैसे दस्तावेज मौजूद हैं, वे भी सुनवाई के लिए बुलाए जाने पर भ्रमित और चिंतित दिखाई दिए। उदाहरण के तौर पर, बैरासात की अंकिता मुखर्जी को नाम की वर्तनी में मामूली अंतर के कारण सुनवाई के लिए बुलाया गया, जबकि उनका दावा है कि उन्होंने पूर्व में भी चुनाव में वोट डाला है। सदैव वरिष्ठ नागरिकों को भी इसी वजह से यातायात और समय की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। चुनाव आयोग के अनुसार पहले चरण में लगभग 32 लाख ऐसे मतदाता को नोटिस भिजवाए गए हैं जिनका संबद्ध रिकॉर्ड पुराने मतदाता सूची से नहीं मिल रहा।
अभिषेक बनर्जी ने चुनाव आयोग पर आरोप लगाया है कि राजनीति और केंद्र की सत्तारूढ़ पार्टी की ओर से निर्देशों के प्रभाव में रहकर एसआईआर अभियान को लागू किया जा रहा है। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर बंगाल में ‘माइक्रो-ऑब्जर्वर’ क्यों भेजे गए हैं जब अन्य राज्यों जैसे गुजरात में ऐसा नहीं किया गया, और कहा कि जब ड्राफ्ट वोटर सूची में लगभग 80 प्रतिशत डेटा मैपिंग दिख रही है तो पहले यह किस आधार पर कहा गया कि 40-50 प्रतिशत मैपिंग अज्ञात है। बनर्जी ने यह तक कहा कि आयोग सही सूची को छिपा रहा है और यह जनता के साथ अन्याय है, अगर आयोग के पास “बांग्लादेशियों की सूची” है तो उसे सार्वजनिक करें, अन्यथा बंगाल के मतदाताओं से माफी मांगें।
TMC नेता ने यह भी आरोप लगाया कि चुनाव आयोग के एप्लिकेशन में तकनीकी और प्रक्रिया संबंधी खामियाँ हैं, तथा इस एप को एक व्यक्ति सीमा खन्ना द्वारा संचालित बताया जा रहा है, जिसके सन्दर्भ में टीएमसी के पास स्क्रीनशॉट भी मौजूद हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर 31 दिसंबर तक आयोग से संतोषजनक जवाब नहीं मिला तो टीएमसी चुनाव आयोग कार्यालय का घेराव करेगी।
इस मामले में टीएमसी का कहना है कि एसआईआर के नाम पर वैध मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए जा रहे हैं, जिससे उनके मताधिकार को खतरा है। पार्टी ने यह भी घोषणा की है कि 2 से 22 जनवरी तक राज्यभर में अभियान चलाया जाएगा ताकि किसी भी वैध मतदाता का नाम अंतिम सूचियों से हटने नहीं पाए।
चुनाव आयोग कह रहा है कि प्रक्रिया पारदर्शी और नियमों के अनुरूप हो रही है और नोटिस, सुनवाई तथा सूची संशोधन के सब्बंध में अपेक्षित जानकारी पहले ही प्रदान कर दी गई है। फिर भी टीएमसी की इस तीखी प्रतिक्रिया ने बंगाल की सियासी गर्मी को और तेज कर दिया है, खासकर 2026 के विधानसभा चुनावों के मद्देनज़र जब हर वोट का महत्व भाजपा और टीएमसी दोनों के लिए अत्यंत अधिक है।
इस विवाद का राजनीतिक और लोकतांत्रिक संवाद पर गहरा प्रभाव पड़ा है, जिसमें मतदाता अधिकारों, डेटा सत्यापन प्रक्रियाओं और चुनाव आयोग की निष्पक्षता जैसे मुद्दे सामने हैं। अब 31 दिसंबर को सीईसी से होने वाली बैठक पर सबकी निगाहें टिकी हैं कि क्या दोनों पक्ष अपने मतभेदों को सुलझा पाएंगे या यह विवाद और अधिक उग्र रूप ले लेगा।



