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अखिलेश के ‘चवन्नी’ बयान से गरमाई यूपी की सियासत, जाटलैंड में BJP-RLD को मिला बड़ा मुद्दा

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उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले पश्चिमी यूपी की सियासत में एक बयान ने राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है। समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने 16 अगस्त को एक कार्यक्रम में बिना नाम लिए राष्ट्रीय लोक दल (RLD) और जयंत चौधरी पर निशाना साधते हुए कहा था, “हम लोगों ने चवन्नी को रुपया बना दिया, तब भी हमें छोड़कर चले गए।” इस बयान को जयंत चौधरी के साथ 2022 के विधानसभा चुनाव में हुए गठबंधन और 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले उनके बीजेपी के साथ जाने से जोड़कर देखा जा रहा है।

अखिलेश यादव के इस बयान को लेकर बीजेपी और RLD ने हमला तेज कर दिया है। RLD की ओर से इसे सिर्फ जयंत चौधरी पर टिप्पणी नहीं बल्कि किसान नेता चौधरी अजीत सिंह, चौधरी चरण सिंह की विचारधारा और किसानों के अपमान से जोड़ने की कोशिश की जा रही है। बीजेपी नेता संगीत सोम ने भी अखिलेश यादव पर निशाना साधते हुए कहा कि समाजवादी पार्टी को मजबूत करने में चौधरी चरण सिंह के परिवार की राजनीतिक भूमिका को नहीं भुलाया जा सकता। इस तरह एक राजनीतिक तंज अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जातीय और किसान राजनीति का मुद्दा बनता दिखाई दे रहा है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट समुदाय का राजनीतिक प्रभाव इस विवाद को और महत्वपूर्ण बनाता है। रिपोर्ट के मुताबिक पश्चिमी यूपी में जाट आबादी करीब 17% के आसपास बताई जाती है और करीब 45 से 50 विधानसभा सीटों पर जाट मतदाता चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकते हैं। यही वजह है कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले जाट वोटों को लेकर बीजेपी, RLD और समाजवादी पार्टी के बीच राजनीतिक खींचतान तेज हो रही है।

2022 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी और RLD ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। उस चुनाव में RLD ने पश्चिमी यूपी में 8 विधानसभा सीटों पर जीत हासिल की थी। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले जयंत चौधरी ने सपा से अलग होकर बीजेपी के साथ गठबंधन कर लिया। अब 2027 में वही RLD बीजेपी के साथ है, जबकि अखिलेश यादव पश्चिमी यूपी में अपने लिए नए सामाजिक समीकरण तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं।

अखिलेश यादव की रणनीति सिर्फ जाट वोटों तक सीमित नहीं दिखाई दे रही है। समाजवादी पार्टी PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वर्ग के समीकरण को मजबूत करने पर जोर दे रही है। इसके साथ ही पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गुर्जर, त्यागी और ब्राह्मण समुदायों तक पहुंच बनाने की कोशिश भी की जा रही है। रिपोर्ट के अनुसार अखिलेश यादव 6 सितंबर को सहारनपुर और 12 सितंबर को बुलंदशहर में कार्यक्रम करने वाले हैं, जिन्हें पश्चिमी यूपी में पार्टी की राजनीतिक जमीन मजबूत करने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।

इस पूरे विवाद में किसान राजनीति भी अहम भूमिका निभा सकती है। पश्चिमी यूपी में जाट समुदाय का किसान राजनीति से गहरा संबंध माना जाता है और कई सीटों पर जाट-मुस्लिम समीकरण भी चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में बीजेपी और RLD की कोशिश होगी कि अखिलेश के बयान को जाट और किसान सम्मान से जोड़कर सपा के खिलाफ माहौल बनाया जाए, जबकि समाजवादी पार्टी यह संदेश देने की कोशिश कर सकती है कि अखिलेश का निशाना केवल जयंत चौधरी की राजनीतिक भूमिका और गठबंधन बदलने के फैसले पर था।

अब 2027 के चुनाव से पहले सबसे बड़ा सवाल यही है कि पश्चिमी यूपी में इस विवाद का राजनीतिक असर कितना होगा। बीजेपी-RLD गठबंधन अगर ‘चवन्नी’ वाले बयान को जाट और किसान सम्मान के मुद्दे में बदलने में सफल रहता है, तो सपा के लिए मुश्किल बढ़ सकती है। दूसरी ओर, अगर अखिलेश यादव अपने PDA समीकरण के साथ गुर्जर, त्यागी, ब्राह्मण और अन्य सामाजिक समूहों में पकड़ मजबूत करने में सफल रहते हैं, तो वह पश्चिमी यूपी में RLD की चुनौती को कुछ हद तक संतुलित कर सकते हैं। फिलहाल इतना साफ है कि 2027 की लड़ाई से पहले पश्चिमी यूपी का जाटलैंड एक बार फिर उत्तर प्रदेश की सत्ता की राजनीति के केंद्र में आ गया है।

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