अरावली पहाड़ों के खनन को लेकर देशभर में चल रहे विवाद और भ्रांतियों के बीच केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने पहली बार साफ शब्दों में सरकार का पक्ष रखा है। कुछ रिपोर्टों और सोशल मीडिया पर यह प्रचार हुआ कि “अब 100 मीटर से कम ऊँचाई वाली अरावली में खनन हो सकेगा और पहाड़ कटेंगे”, जिससे पर्यावरण संतुलन और दिल्ली-एनसीआर के लिए गंभीर खतरा पैदा होगा। लेकिन मंत्री यादव ने इस दावे को पूरी तरह गलत और भ्रामक बताया। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय और सरकार की नीति का मकसद अरावली को बचाना है न कि उसके संरक्षण को कमजोर करना।
यादव ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपनाई गई “100 मीटर की परिभाषा” का अर्थ यह नहीं है कि नीचे के हिस्सों में खुला खनन शुरू हो जाएगा। यह मानदंड पहाड़-ढांचा का पूरा उभार — जमीन से ऊपर की ऊँचाई तक — तय करने के लिए है, न कि सिर्फ ऊपरी हिस्से को ही पहाड़ी मानने के तौर पर। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि पूरे पहाड़ के आकार और ढलान सहित हिस्सों को ही पहाड़ी के रूप में संरक्षित किया जाए और उसके आधार पर खनन नियम लागू हों।
मंत्री ने कहा कि नई परिभाषा के बावजूद 90 % से अधिक अरावाली क्षेत्र अब भी संरक्षण के दायरे में है, और केवल लगभग 0.19 % क्षेत्र में ही विचार के लिए माइनिंग की संभावना हो सकती है, लेकिन उसके लिए प्राकृतिक संसाधन पर वैज्ञानिक तैयारी और निगरानी आवश्यक है। उन्होंने यह भी बताया कि नई योजना के तहत कोई नया खनन पट्टा सुप्रीम कोर्ट और वैज्ञानिक समिति की मंजूरी के बिना नहीं मिलेगा, और अवैध खनन को पूरी तरह रोकने के लिए कड़े नियम लागू होंगे।
यादव ने यह भी कहा कि विपक्षी कुछ समूह और सोशल मीडिया पर कुछ चैनल “100 मीटर नियम” को गलत तरीके से पेश कर रहे हैं, जिससे जनता में भ्रम फैल रहा है। उन्होंने यह दोहराया कि सरकार ने पर्यावरण संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है और वास्तव में खनन को बढ़ावा नहीं देना चाहती। अरावली की संरक्षण नीति अब सांझा वैज्ञानिक मानकों के आधार पर तैयार की जा रही है ताकि आजीवन संरक्षित पारिस्थितिकी तंत्र, जल स्रोतों और प्राकृतिक संतुलन को सुरक्षित रखा जा सके।
इस बयान के बाद राजनीतिक और सामाजिक रूप से अरावली विवाद में कटु बहस जारी है, लेकिन केंद्रीय मंत्री का कहना है कि वास्तविक नीति और फैसले का उद्देश्य अरावली के संरक्षण को मजबूत करना है, न कि कमजोर करना।
