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पूरे अरावली को संरक्षित क्षेत्र में शामिल किया जाएगा

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केंद्र सरकार ने अरावली पर्वतमाला को लेकर एक बड़ा निर्णय लिया है, जिसका उद्देश्य भारत की सबसे पुरानी और पारिस्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण पर्वत श्रृंखला अरावली को और अधिक सुरक्षित बनाना है। केंद्र ने स्पष्ट किया है कि पूरे अरावली क्षेत्र को संरक्षित जोन के अंतर्गत लाया जाएगा और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार कोई भी नया खनन पट्टा जारी नहीं किया जाएगा जब तक कि पूरे अरावाली पर “सस्टेनेबल माइनिंग” के लिए वैज्ञानिक रूप से तैयार की गई प्रबंधन योजना (Management Plan for Sustainable Mining) नहीं बन जाती।

केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने इस मुद्दे पर कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने चार राज्यों — दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात — में अरावली की एक समान और वैज्ञानिक परिभाषा अपनाने का आदेश दिया है ताकि पहले मौजूद खामियों को समाप्त किया जा सके और अवैध खनन को रोकने में मदद मिले। उन्होंने कहा कि खनन की अनुमति केवल उन्हीं क्षेत्रों में दी जाएगी जहां वैज्ञानिक अध्ययन के बाद तय किया जाएगा कि वहां सतत खनन संभव है, और उस योजना के लागू होने तक किसी भी नए पट्टे पर रोक रहेगी।

सरकार का यह भी कहना है कि इस नए नियम के लागू होने से ज़्यादातर अरावली क्षेत्र — अनुमानतः लगभग 90 प्रतिशत से अधिक भाग — संरक्षित जोन में रहेगा और खनन, निर्माण या अनियंत्रित गतिविधियों के लिए खुला नहीं होगा। वहीं, केंद्र ने यह भी स्पष्ट किया है कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) में तो खनन पर पूरी तरह प्रतिबंध लागू रहेगा और पहले से संरक्षित वन्यजीव अभयारण्यों और टाइगर रिज़र्व क्षेत्रों को अतिरिक्त सुरक्षा मिलेगी।

हालाँकि इस फैसले के बाद राजनीतिक और सामाजिक विवाद भी तेज़ हो गया है। कुछ विपक्षी नेताओं और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का तर्क है कि “100 मीटर” की नई ऊँचाई-आधारित परिभाषा के कारण छोटे-छोटे पहाड़ियाँ और ढलान अरावली के संरक्षण से बाहर हो सकते हैं, जिससे उन इलाकों में खनन और निर्माण गतिविधियाँ बढ़ सकती हैं और पर्यावरण को नुकसान हो सकता है।

राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेसी नेता अशोक गहलोत ने भी केंद्र की नीति पर सवाल उठाया है और कहा है कि इसके परिणामस्वरूप संवेदना के अनुसार संवेदनशील इलाकों में खनन के रास्ते खुल सकते हैं, जिसे वे “पर्यावरण के लिए खतरनाक” मानते हैं।

वहीं केंद्र का दावा है कि सुप्रीम कोर्ट की मंज़ूरी और नए नियमों के तहत वन्यजीव अभयारण्यों तथा संवेदनशील पारिस्थितिक इकाइयों की सुरक्षा प्राथमिकता रहेगी और सरकार “ग्रीन अरावली” की दिशा में प्रतिबद्ध है। इस प्रयास का एक बड़ा हिस्सा चारों राज्यों में एकसमान नियम लागू करना है ताकि पहले की तरह विभिन्न मानदंडों के कारण संरक्षण में अंतर न रह जाए और अवैध खनन को रोका जा सके।

पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि अरावली पर्वतमाला सिर्फ़ पहाड़ों का समूह नहीं है, बल्कि भूजल का स्रोत, जैव विविधता का आश्रय और हवा-पानी के संतुलन के लिए आवश्यक एक प्राकृतिक ढाल है। इसलिए, यदि इसे उचित तरीके से संरक्षित नहीं किया गया तो इससे न केवल स्थानीय स्तर पर, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर पारिस्थितिक असंतुलन और जल संकट जैसी समस्याएँ उभर सकती हैं।

इस पूरे फैसले के प्रभाव, उसकी कानूनी प्रक्रिया और लंबी अवधि की पर्यावरणीय रणनीति को लेकर बहस जारी है। सरकार का कहना है कि कदम अवैध खनन रोकने, खनन पट्टों पर वैज्ञानिक नियंत्रण लागू करने और पर्यावरण की रक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में है, जबकि आलोचक इसे संरक्षण के नाम पर कुछ क्षेत्रों को खुला छोड़ने का प्रयास मानते हैं। स्वतंत्र पर्यावरण विशेषज्ञों का तर्क है कि वास्तव में मूल चुनौती “स्थायी संरक्षण और सतत व्यवस्था” के बीच संतुलन बनाना है, ताकि अरावली की पारिस्थितिकी, स्थानीय समुदाय, अर्थव्यवस्था और जलवायु संतुलन सबको सुरक्षित रखा जा सके।

इस प्रकार, अरावली को लेकर केंद्र सरकार का यह नया निर्णय न केवल पर्यावरणीय संरक्षण नीति का एक महत्वपूर्ण अध्याय है, बल्कि यह राजनीतिक, सामाजिक और विज्ञान-आधारित बहस का केंद्र भी बन गया है।

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