देश के पूर्वी राज्यों असम और पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले AIMIM प्रमुख Asaduddin Owaisi ने अपनी रणनीति साफ कर दी है, जिसने राजनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है। ओवैसी ने एक तरफ असम में Badruddin Ajmal की पार्टी AIUDF को समर्थन देने का फैसला किया है, वहीं पश्चिम बंगाल में उन्होंने Humayun Kabir की पार्टी के साथ गठबंधन कर चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी की है। इस ‘डबल रणनीति’ को राजनीतिक विश्लेषक मुस्लिम वोट बैंक को साधने की बड़ी कोशिश के तौर पर देख रहे हैं।
असम में ओवैसी की पार्टी AIMIM सीधे चुनाव नहीं लड़ रही, बल्कि AIUDF के पक्ष में प्रचार करने जा रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ओवैसी 2 और 3 अप्रैल को असम में कई जनसभाएं करेंगे और अजमल के उम्मीदवारों के लिए वोट मांगेंगे। इस कदम का सीधा असर राज्य के मुस्लिम वोट बैंक पर पड़ सकता है, जो पहले से ही कांग्रेस और अन्य दलों के बीच बंटा हुआ है। ऐसे में AIMIM का समर्थन AIUDF को मजबूती दे सकता है, लेकिन साथ ही विपक्षी वोटों के बिखराव की आशंका भी बढ़ा सकता है।
वहीं पश्चिम बंगाल में ओवैसी ने अलग रणनीति अपनाई है। यहां उन्होंने हुमायूं कबीर की पार्टी के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ने का फैसला किया है। दोनों दल मिलकर कई सीटों पर संयुक्त रूप से उम्मीदवार उतारने की योजना बना रहे हैं और खासकर मुस्लिम बहुल क्षेत्रों—जैसे मुर्शिदाबाद और मालदा—पर फोकस किया जा रहा है। इस गठबंधन को राज्य की पारंपरिक राजनीति, खासकर तृणमूल कांग्रेस के वोट बैंक के लिए चुनौती माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ओवैसी की यह रणनीति केवल सीट जीतने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह पूर्वी भारत में अपनी पार्टी की मजबूत मौजूदगी बनाना चाहते हैं। असम में AIUDF को समर्थन और बंगाल में गठबंधन—दोनों कदम मिलकर AIMIM के विस्तार की दिशा में बड़ा संकेत देते हैं।
हालांकि, इस रणनीति को लेकर राजनीतिक मतभेद भी हैं। कुछ विश्लेषकों का कहना है कि ओवैसी की एंट्री से मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण हो सकता है, जिससे फायदा किसी एक पार्टी को नहीं, बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से अन्य दलों—जैसे BJP—को मिल सकता है। वहीं, AIMIM का दावा है कि वह सिर्फ वंचित और अल्पसंख्यक वर्ग की आवाज उठाने के लिए मैदान में उतर रही है।
कुल मिलाकर, असम और बंगाल चुनाव में ओवैसी का यह ‘गेम प्लान’ चुनावी गणित को काफी हद तक बदल सकता है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि उनकी यह रणनीति वास्तव में किसे फायदा पहुंचाती है—AIUDF और उनके सहयोगी दलों को या फिर इससे विपक्षी वोटों का बिखराव होगा।
